कविता
सायरन के बीच में से आयी,
बड़ी ख़बर।
मृतकों की संख्या प्रत्येक मिनट में बढ़ रही है।
क्या किसीने देखा,
उन मृतकों के पीछे छिपे,
वे अदृश्य मृतक?
जो तन से नहीं, पर मन से मर रहे हैं,
धीरे-धीरे..
ले रही हैं अपनी उम्मीदों की आखिरी सांस।
अहम की भी क्या खूबी है!
अहम के अहमकार की वजह से,
अहम को मिटा लेने में,
तुला हुआ अहम!
काश उस अहम से,
‘अ’ हटाकर देखने के लिए,
मिलीसेकंड का समय मिला होता उनको,
तो आज यह दिन नहीं आता
— कलणि वि. पनागॉड, श्री लंका
