चांद मिलता नहीं है आसान से
धुंधली सी राह
आकाश में टंगा चांद
मन की प्यास
सन्नाटा गहरा
झील में चांदनी तैरे
खामोश रात
धीमी सी हवा
बादलों के आंचल में
छिपा उजास
दूर कहीं से
रजनी का मधुर स्पर्श
जगती आस
थकी हुई आंखें
क्षितिज को तकती रहें
सपनों का दीप
कभी धुंधला
कभी उजली किरणें
मुस्काए गगन
चांद की चाह
सदियों से मनुष्य का
अनकहा स्वप्न
मिलता कब है
जो सहज ही मिल जाए
चांद सा लक्ष्य
— डॉ. अशोक
