अकेला इंसान
ज़रूरत के वक्त अक्सर अकेला पड़ता इंसान,
भीड़ में रहते हुए भी ढूँढता है अपनी पहचान।
जहाँ तक ताकत रहीं साथ बहुत मिल जाते हैं,
मुश्किल की ‘आंधी’ आते रिश्ते बिखर जाते हैं।
हँसी-ठट्ठे के मेलों में सभी अपने लगते हैं यहाँ,
‘आँसुओं’ की बारिश में कम ही ठहरते हैं वहाँ।
तभी समझ आता है दुनिया का सच्चा पैमाना,
साथ वहीं है जो दर्द में भी नहीं छोड़े ठिकाना।
अकेलापन सिखा देता है ख़ुद से दोस्ती करना,
गिरकर भी हर बार फिर से संभलना व चलना।
ज़रूरत के समय चाहे अकेला रह जाए इंसान,
गर हौसला साथ हो तो ‘पार’ करता हर तूफान।
— संजय एम तराणेकर
