गीत/नवगीत

जो नियम बना, वो तोड़ दिया

महाभारत के युद्ध से पहले कितने नियम बनाए,
किंतु कौरव पक्ष ने वे सारे ही नियम भुलाए।
माना कि युद्ध करने के लिए व्यूह रचना भी करनी होती है,
दुश्मन को हराने की खातिर नीतियाँ बनानी होती हैं।
जब तक भीष्म सेनापति रहे, कोई युद्ध का नियम नहीं टूटा।
गुरु द्रोण बने जब सेनापति, जो नियम बना, तोड़ दिया गया।
दुर्योधन को जब लगा कि हम यह युद्ध जीत नहीं पाएंगे,
आपस में किया मशविरा कि कल चक्रव्यूह बनाएंगे।
पांडव सेना में केवल अर्जुन को उसे भेदना आता है।
या फिर उसके पुत्र अभिमन्यु को भेदना आता है।
लेकिन अभिमन्यु उससे बाहर आना नहीं जानता है
इसलिए मेरे मन में एक ऐसा विचार आता है।
कल अर्जुन को युद्ध से हमें इतनी दूर भिजवाना है,
संध्या तक वापस आ न पाए, ऐसा उपाय अपनाना है।

बुला सुशर्मा राजा को, दुर्योधन ने उसको बोला,
कल अर्जुन को ललकार युद्ध में, ताबड़तोड़ भाग जाना।
बार-बार पीछे मुड़कर यह भी देखते रहना है,
अर्जुन वापस ना आ पाए, जीवन की बाजी खेलना है।
अर्जुन वापस यदि आने लगे,तो बार-बार ललकार उसे,
शाम का प्रहर होने से पहले, वापस न आने देना उसे।
इस तरफ चक्रव्यूह बना रहे, दूसरी दिशा में जाना है।
वो शाम तलक यहाँ आ न सके,यह लक्ष्य तुझे अपनाना है

अगले दिन युद्ध शुरू होते ही सुशर्मा अर्जुन को ललकारने लगा।
अर्जुन अपने रथ पर चढ़कर उसके पीछे भागने लगा।
श्री कृष्ण ने कितना समझाया कि इसमें कोई रहस्य छिपा,
बेमतलब इसका पीछा कर, अपनी शक्ति यूँ नहीं खपा।
कैसे ना इससे युद्ध करूँ, जब मुझको यह ललकार रहा?
युद्ध से इस तरह विमुख होना, क्षत्रिय का नहीं ये धर्म रहा।
उस तरफ कौरवों ने लड़ने को चक्रव्यूह निर्माण किया।
अभिमन्यु ने चक्रव्यूह भेद, अन्दर तलक प्रवेश किया।
धर्मराज युधिष्ठिर की सेना चक्रव्यूह के अंदर जाने लगी,
तब जयद्रथ की सेना के आगे, कोई ना उनकी दाल गली।
अंदर अभिमन्यु अकेला था, बाहर न निकलना आता था।
पर उस एक अकेले ने कितनों को, मौत के घाट उतारा था।
छह महारथियों ने घेर लिया, और अन्धाधुन्ध प्रहार किया।
उसके रथ को तोड़ दिया, और सारथी को भी मार दिया

द्रोण,कर्ण और कृपाचार्य, कृतवर्मा, अश्वत्थामा, शकुनि,
छह- छह महारथियों ने मिल एक अकेले को मारा।
धनुष- बाण सब टूट गए थे, सारथी को भी मार दिया ,
रथ भी उसका टूट गया, फिर भी वह रण में डटा रहा।
उन सबके बाणों के प्रहार को, छाती पर सहता ही रहा।

एकदम निहत्था था किशोर, वे सभी लोग रथ पर सवार,
अंधाधुंध करते रहे सभी, उस एक अकेले पर प्रहार।
नहीं बचा था शस्त्र कोई, तब भी प्रहार करते ही रहे।
जो नियम बने थे युद्ध के,उन नियमों को तोड़ते रहे।
आखिर में रथ के चक्के को लेकर के अभिमन्यु दौड़ा।
लेकिन उन छह महारथियों ने उसका जीवन लेकर छोड़ा।
इहलीला जब हो गई समाप्त ,तो छहों ने मिलकर नृत्य किया।
उन सबका ही कुछ लगता था, तब भी नृशंस यह कृत्य किया।
सिर्फ एक अकेला यह किस्सा अब तक सुनने में आता है।
शिष्य पुत्र व भाई पुत्र को कोई इस तरह मारता है?
द्रोण, कृपाचार्य गुरु थे,गुरुओं को लाज नहीं आई,
ऐसा नृशंस संहार देख लज्जा को भी लज्जा आई।

— राधा गोयल

राधा गोयल

जन्मतिथि:-03/08/1948 शिक्षा:-स्नातक,बी.एड,कटिंग टेलरिंग सर्टिफिकेट कोर्स, योग डिप्लोमा,रंग चिकित्सा, मुद्रा विज्ञान, शिवाम्बु चिकित्सा व एक्यूप्रेशर का अल्पकालिक कोर्स रुचियाँ:-पाक कला, पठन-पाठन, लेखन, व्यर्थ समझी जाने वाली वस्तुओं का उचित उपयोग, पर्यावरण संरक्षण के लिए जागरूक व अन्य को जागरूक करने में प्रयासरत प्रकाशित पुस्तकें :- *11 एकल पद्य संग्रह* काव्य मंजरी/ निनाद/ जीवन एक खिलौना/ नयी उम्मीद नया आसमान / अजब अनोखे खेल / एक ख्वाब अधूरा सा/ आपातकाल में सृजन फुलवारी/ अन्तर्नाद/ ऊँची नीची है डगरिया/ *प्यासी धरती तपस्विनी सी*/*भीगे सपने* *16एकल गद्य संग्रह* पाती प्रीत भरी (भाग -1)/ पाती प्रीत भरी (भाग-2)/हादसा/नया मोड़/क्या- क्या न सहे हमने सितम/तेरे नाम/यादों के झरोखे से (भाग-1)/ गली जाजमपुरिया (उपन्यास)/सृजन समीक्षा/बकरा मिल गया/अकस्मात/ यात्रा वृत्तांत/ देश- परदेश भाग- 1/यात्रा वृत्तांत देश परदेश भाग-2 सामाजिक मुद्दे श्रृंखला-1 सामाजिक मुद्दे श्रृंखला-2 *कब जागोगे* *मन के जीते जीत है* 1976 से 1978 के दौरान नियमित रूप से एक मासिक पत्रिका में रचनाओं का प्रकाशन 15 *अन्तरराष्ट्रीय स्तर के साझा संकलन* -50 से अधिक साझा संग्रह -प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित/गोल्डन बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड /लन्दन बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड,अनेक वेब पोर्टल:- स्टोरी मिरर, प्रतिलिपि, हिन्दी प्रतिलिपि, युवा प्रवर्तक, हिन्दी भाषा डाॅट काॅम, नवकिरण द्वै मासिक पत्रिका, आदित्य संस्कृति व अन्य ई- पत्रिकाओं में रचनाओं का नियमित प्रकाशन विशेष:-मेरी एक गद्य पुस्तक *नया मोड़* को पुरस्कृत श्रेणी की पुस्तकों में चयनित किया गया। आदित्य संस्कृति द्वारा आयोजित इस प्रतियोगिता में 368 लेखकों ने अपनी प्रविष्टियां दी थीं, जिनमें 22 लेखकों की पुस्तकें चयनित हुईं। -एक अन्य पुस्तक *तेरे नाम* को भी पुरस्कृत किया गया। इसमें 168 लेखकों ने अपनी प्रविष्टियाँ प्रस्तुत की थीं। सम्मान:- शताधिक मिले, कभी गिने ही नहीं। चलितभाष :- 9811599770 अणुमेल radhagoyal222@gmail.com एफ-420, विकास पुरी, नई दिल्ली-110018