कविता

नीड़हीन चिड़िया

सूने आँगन की धूल बनी,
मैं स्मृतियों में रोती हूँ।
टूटी छत की छाया तले,
बिखरे सपनों को ढोती हूँ।

कल तक गाती थी जो धुन,
अब वह स्वर भी खोया है।
नीड़ जलाकर समय ने जैसे
मन का वन भी रोया है।

नीले नभ की गोद कहीं,
अब तो धुंध में सोती है।
पंख थके, पथ दूर हुआ,
आशा भी अब रोती है।

फिर भी मौन व्यथा लेकर
मैं गगन पुकारती हूँ—
खोए आँगन, खोए नभ में
अपना घर निहारती हूँ।

— डॉ. प्रियंका सौरभ

*डॉ. प्रियंका सौरभ

रिसर्च स्कॉलर इन पोलिटिकल साइंस, कवयित्री, स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार, (मो.) 7015375570 (वार्ता+वाट्स एप) facebook - https://www.facebook.com/PriyankaSaurabh20/ twitter- https://twitter.com/pari_saurabh