विश्व की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था : भारत की उड़ान और उसकी चुनौतियां
मार्च 2026 में भारत की अर्थव्यवस्था के बारे में जो आंकड़े सामने आ रहे हैं, वे निश्चित रूप से गर्व करने योग्य हैं। देश का सकल घरेलू उत्पाद वित्त वर्ष 2026 में 7.6 प्रतिशत की दर से बढ़ने का अनुमान है जो पिछले वित्त वर्ष के 6.5 प्रतिशत से काफी अधिक है। वित्त वर्ष 2026 की तीसरी तिमाही में सकल घरेलू उत्पाद वृद्धि 7.82 प्रतिशत दर्ज हुई। सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय ने भी सकल घरेलू उत्पाद का आकलन पहले के 7.4 प्रतिशत से बढ़ाकर 7.6 प्रतिशत कर दिया। 2025 के मध्य में भारत जापान को पीछे छोड़कर अमेरिका, चीन और जर्मनी के बाद विश्व की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन गया। यह उपलब्धि मामूली नहीं है, यह दशकों की मेहनत, सुधारों और करोड़ों भारतीयों की उद्यमशीलता का प्रतिफल है।
इस वृद्धि के पीछे कई ठोस कारण हैं। विनिर्माण क्षेत्र ने 13.3 प्रतिशत की अभूतपूर्व दर से वृद्धि की जो पिछले कई वर्षों का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन है। निर्माण क्षेत्र 6.57 प्रतिशत की दर से बढ़ा, सेवा क्षेत्र 5 से 11 प्रतिशत के बीच रहा। निजी उपभोग और निवेश दोनों ही वृद्धि के मुख्य चालक बने रहे। भारतीय रिजर्व बैंक ने दिसंबर 2025 में रेपो दर 25 आधार अंक घटाकर 5.25 प्रतिशत की जो उपभोक्ता खर्च और ऋण वृद्धि के लिए अनुकूल रहा। महंगाई दर के मोर्चे पर भी राहत रही – उपभोक्ता मूल्य सूचकांक पर आधारित मुद्रास्फीति 2 प्रतिशत के निचले स्तर पर आ गई जो RBI के लक्ष्य 4 प्रतिशत से बहुत कम है। गोल्डमैन सैक्स ने 2026 के लिए 6.9 प्रतिशत वृद्धि का अनुमान दिया है जो वैश्विक औसत अनुमान से ऊपर है।
व्यापार समझौतों की सफलता और नई संभावनाएं
2026 में भारत के लिए एक बड़ी उपलब्धि अंतरराष्ट्रीय व्यापार के मोर्चे पर भी आई। फरवरी 2026 में भारत और अमेरिका के बीच व्यापार समझौते की घोषणा हुई जिसमें भारतीय निर्यात पर ‘पारस्परिक’ शुल्क 25 प्रतिशत से घटाकर 18 प्रतिशत किया गया। गोल्डमैन सैक्स के अनुसार इससे सकल घरेलू उत्पाद वृद्धि में लगभग 0.2 प्रतिशत अंक का अतिरिक्त लाभ होगा। इससे भी बड़ी बात यह है कि जनवरी 2026 में भारत और यूरोपीय संघ ने 20 साल की लंबी बातचीत के बाद एक ऐतिहासिक मुक्त व्यापार समझौते पर सहमति जताई जिसे ‘सौदों की जननी’ कहा जा रहा है। यह समझौता 2027 की शुरुआत में प्रभावी होने की उम्मीद है और इसके तहत 90 प्रतिशत से अधिक वस्तुओं पर शुल्क घटाए जाएंगे या समाप्त किए जाएंगे। शराब, खाद्य उत्पाद, मशीनरी, रसायन, विमान और चिकित्सा उपकरण जैसे यूरोपियन यूनियन के प्रमुख निर्यात क्षेत्रों में भारत में बाजार पहुंच बढ़ेगी जबकि यूरोपियन यूनियन भारतीय वस्त्र और रसायनों को आसान प्रवेश देगा।
भारतीय रिजर्व बैंक ने हाल ही में बैंकिंग प्रणाली में 6.3 लाख करोड़ रुपये (लगभग 70 अरब डॉलर) की तरलता डाली जिससे ऋण वृद्धि में सुधार की उम्मीद है। इंफ्रास्ट्रक्चर पर सरकारी पूंजी व्यय की गति बनाए रखने का प्रयास जारी है। डिजिटल अर्थव्यवस्था के क्षेत्र में भारत का सार्वजनिक क्लाउड सेवा बाजार 2026 तक 13 अरब डॉलर तक पहुंचने का अनुमान है जो 2021-26 के बीच 23.1 प्रतिशत की चक्रवृद्धि वार्षिक वृद्धि दर (सीएजीआर) से बढ़ा है। डेटा सेंटर क्षमता में भी भारत एशिया-प्रशांत क्षेत्र में अग्रणी बन गया है। डिजिटलीकरण और औपचारिकीकरण की प्रक्रिया से सकल घरेलू उत्पाद आंकड़ों की विश्वसनीयता भी बढ़ रही है – सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय ने जनवरी 2026 में सकल घरेलू उत्पाद श्रृंखला में सुधार किए और आधार वर्ष 2012 से बदलकर वित्त वर्ष 2023 किया।
चुनौतियां जो अनदेखी नहीं की जा सकतीं
हालांकि इस तेज वृद्धि के बीच कुछ गंभीर चुनौतियां भी हैं जिन्हें नजरअंदाज करना भारत की भविष्य की राह के लिए खतरनाक होगा। सबसे पहली चुनौती रुपये की कमजोरी है। 2025 में रुपया एशिया की सबसे कमजोर मुद्राओं में शामिल था क्योंकि विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों ने भारतीय शेयर बाजार से करीब 19 अरब डॉलर निकाल लिए। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के एक अध्ययन ने भारत के सकल घरेलू उत्पाद आंकड़ों को ‘C ग्रेड’ दिया था जो आंकड़ों की सटीकता पर सवाल उठाता है – हालांकि नए सकल घरेलू उत्पाद सीरीज से इस समस्या का समाधान होने की उम्मीद है। कृषि क्षेत्र में वृद्धि महज 1.42 प्रतिशत रही जो ग्रामीण खपत और आजीविका के लिए चिंताजनक है। चालू खाता घाटा 2025 की चौथी तिमाही में सकल घरेलू उत्पाद के 2.8 प्रतिशत तक पहुंच गया जो पिछली तिमाही के 1.3 प्रतिशत से काफी अधिक है।
ईरान-इजराईल-अमेरिका युद्ध के कारण तेल की बढ़ती कीमतें भारत के लिए एक नई मुसीबत बनकर सामने आई हैं। भारत को अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात करना पड़ता है और 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर का तेल देश के व्यापार घाटे, सरकारी वित्त और आम आदमी की जेब सभी पर असर डालेगा। इसके अलावा अमेरिकी टैरिफ का दबाव पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है, वस्त्र, समुद्री उत्पाद, रत्न-आभूषण, वाहन पुर्जे और चमड़ा जैसे क्षेत्रों में निर्यात प्रभावित हुए हैं। स्टैंडर्ड चार्टर्ड बैंक की अर्थशास्त्री अनुभूति सहाय का कहना है कि जब तक वैश्विक ब्याज दरें अन्य देशों में 4-4.5 प्रतिशत पर बनी रहेंगी, विदेशी पूंजी प्रवाह भारत के लिए एक चुनौती रहेगा। देश में व्यापार करने की सरलता और गति में सुधार अभी और जरूरी है। तमाम चमक-दमक के बावजूद भारत की वृद्धि गाथा तभी स्थायी बनेगी जब यह वृद्धि खेत-खलिहान और झुग्गी-बस्ती तक भी पहुंचे।
— डॉ. शैलेश शुक्ला
