अप्पो दिप्पो भव
गहरी काली रात में अब्दुल घर की चौखट पर दिया लिए खड़ा किसी का इंतजार कर रहा था। ठंडी हवा के झोंको से दिये की लौ बार बार हिलने लगती। तभी एक झोंका उसके कानों में फुसफुसाकर बोला,”हर रात हाथ से लैम्प जलाये क्यों चले आते हो? तुम्हें डर नहीं लगता?”
“इन धमाकों से डरकर निराशा में जी रहा था। इन्तजार कर था कि मेरा बेटा लौट आयेगा।”
“मैंने कहा था कि तुम्हारे लाख समझाने का उस पर कोई असर नहीं होगा। लालच के फरेबी जाल से मुक्त होना बहुत मुश्किल है।”
“न जाने क्या होता जा रहा है युवा पीढ़ी को? कुछ अलग कर गुजरने के लिये दिशाहीन होते जा रहे हैं।”
रात की ठंडी हवा के झोंके से काँपती हुई लौ बोली, “सच्चाई तुम जानते हो। उसकी भटकन ने उसे सीमा पार बन्दूक थमा दिया है। अब वह तुम्हारा बेटा नहीं सिर्फ आकाओं का मोहरा है। अब्दुल! जाओ घर जाओ।”
“तुम ठीक कहती हो। मैं घर नहीं, घर-घर जाऊँगा। जिससे मेरी तरह दूसरे माँ-बाप औलाद से बेऔलाद न हो जाये और दहशत में न जियें।”
लौ मुस्कुरायी और स्थिर हो गयी। उसे देख अब्दुल ने कहा,”तुम रोशनी ही नहीं, उम्मीद हो। उम्मीद ही ज़िन्दगी है। अब मेरे अन्दर अँधेरा नहीं, न ही डर है।”
— डाॅ. अनीता पंडा ‘अन्वी’
