राजनीति

बदलती विश्व व्यवस्था में भारत की विदेश नीति: अवसर और दायित्व

14 मार्च 2026 की शाम जब भारत में यह संपादकीय लिखा जा रहा है, तब अंतरराष्ट्रीय राजनीति एक असाधारण अस्थिरता के दौर से गुजर रही है। दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में एक साथ कई गंभीर संकट सक्रिय हैं और इन सभी का प्रभाव वैश्विक शक्ति संतुलन पर पड़ रहा है। पश्चिम एशिया में अमेरिका और इजराइल की सैन्य कार्रवाइयों ने क्षेत्रीय तनाव को बढ़ा दिया है, रूस-यूक्रेन युद्ध तीसरे वर्ष में भी थमने का नाम नहीं ले रहा, पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच सीमा संघर्ष अब लगभग खुले युद्ध की स्थिति तक पहुंच गया है, वैश्विक व्यापार व्यवस्था में संरक्षणवादी नीतियों और टैरिफ युद्धों की वापसी दिखाई दे रही है और इसके साथ ही जलवायु संकट तथा वैश्विक खाद्य असुरक्षा जैसी दीर्घकालिक चुनौतियां भी लगातार गहराती जा रही हैं। ऐसे जटिल वैश्विक वातावरण में भारत एक ऐसे कूटनीतिक मोड़ पर खड़ा है जहां उसकी भूमिका केवल एक क्षेत्रीय शक्ति की नहीं रह गई है, बल्कि एक उभरती वैश्विक शक्ति के रूप में उससे अपेक्षाएं भी कहीं अधिक बढ़ गई हैं।

पिछले कुछ वर्षों में भारत की आर्थिक और राजनीतिक स्थिति में महत्वपूर्ण परिवर्तन आया है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व बैंक के अनुमानों के अनुसार भारत विश्व की सबसे तेज़ी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में से एक बना हुआ है और नाममात्र जीडीपी के आधार पर वह दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की दिशा में अग्रसर है। लगभग 1.4 अरब की आबादी, तेजी से बढ़ती डिजिटल अर्थव्यवस्था, विशाल उपभोक्ता बाजार और अपेक्षाकृत स्थिर लोकतांत्रिक संस्थाओं ने भारत को वैश्विक शक्ति संरचना में एक महत्वपूर्ण स्थान दिलाया है। 2023 में जी20 की अध्यक्षता के दौरान भारत ने स्वयं को “वैश्विक दक्षिण की आवाज़” के रूप में प्रस्तुत किया था और अफ्रीकी संघ को जी20 की स्थायी सदस्यता दिलाने में उसकी भूमिका को व्यापक रूप से एक कूटनीतिक सफलता के रूप में देखा गया। लेकिन विश्व राजनीति की वास्तविकता यह है कि प्रतिष्ठा और अपेक्षाएं साथ-साथ आती हैं। आज जब दुनिया अनेक संकटों से घिरी है, तब यह प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठता है कि भारत अपनी विदेश नीति के माध्यम से इन चुनौतियों का सामना किस प्रकार करेगा और उसकी “रणनीतिक स्वायत्तता” की नीति इन दबावों के बीच कितनी प्रभावी साबित होगी।

भारत की विदेश नीति लंबे समय से “रणनीतिक स्वायत्तता” के सिद्धांत पर आधारित रही है। शीत युद्ध के दौर में यह नीति गुटनिरपेक्षता के रूप में प्रकट हुई थी, जबकि वर्तमान समय में इसका अर्थ है—किसी एक महाशक्ति के साथ स्थायी गठबंधन के बजाय मुद्दों के आधार पर सहयोग और स्वतंत्र निर्णय-क्षमता बनाए रखना। इस नीति का सबसे बड़ा लाभ यह रहा है कि भारत ने अमेरिका, रूस, यूरोप, पश्चिम एशिया और एशिया-प्रशांत क्षेत्र के देशों के साथ एक साथ संबंध बनाए रखे हैं। किंतु वर्तमान वैश्विक परिस्थितियों में यही नीति अपनी सबसे कठिन परीक्षा से गुजर रही है। पश्चिम एशिया में चल रहे संघर्षों के दौरान भारत की प्रतिक्रिया को लेकर अंतरराष्ट्रीय टिप्पणीकारों के बीच बहस हुई है। कुछ विश्लेषकों ने यह तर्क दिया है कि भारत की सावधानीपूर्ण और अपेक्षाकृत मौन प्रतिक्रिया ने उसकी पारंपरिक संतुलन नीति को चुनौती के सामने खड़ा कर दिया है, क्योंकि भारत लंबे समय से इजराइल और अरब जगत दोनों के साथ घनिष्ठ संबंध बनाए रखने का प्रयास करता रहा है।

इस संदर्भ में मध्य-पूर्व के साथ भारत के संबंधों की वास्तविकता को समझना आवश्यक है। खाड़ी क्षेत्र भारत के लिए केवल कूटनीतिक महत्व का क्षेत्र नहीं है, बल्कि यह उसकी आर्थिक और सामाजिक संरचना से भी गहराई से जुड़ा हुआ है। भारत के विदेश मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार खाड़ी देशों में लगभग 80 से 90 लाख भारतीय नागरिक काम करते हैं। ये प्रवासी हर वर्ष अरबों डॉलर का प्रेषण भारत भेजते हैं, जो भारतीय अर्थव्यवस्था और लाखों परिवारों के जीवनयापन के लिए महत्वपूर्ण है। इसके अतिरिक्त भारत की ऊर्जा सुरक्षा भी काफी हद तक पश्चिम एशिया पर निर्भर है। सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, कुवैत और इराक जैसे देश भारत के प्रमुख तेल आपूर्तिकर्ता हैं। यही कारण है कि भारत को अपनी विदेश नीति में संतुलन बनाए रखने के लिए अत्यंत सावधानी बरतनी पड़ती है। इजराइल के साथ भारत के रक्षा, कृषि और प्रौद्योगिकी सहयोग महत्वपूर्ण हैं, वहीं अरब देशों के साथ ऊर्जा, व्यापार और प्रवासी संबंध उतने ही आवश्यक हैं। इस जटिल संतुलन को बनाए रखना किसी भी सरकार के लिए आसान कार्य नहीं है।

मध्य-पूर्व के बाद भारत की विदेश नीति की दूसरी बड़ी चुनौती चीन और अमेरिका के बीच बढ़ती रणनीतिक प्रतिस्पर्धा है। पिछले एक दशक में यह प्रतिस्पर्धा केवल व्यापारिक विवादों तक सीमित नहीं रही, बल्कि तकनीकी, सैन्य और वैचारिक क्षेत्रों में भी फैल चुकी है। इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में चीन के बढ़ते प्रभाव और दक्षिण चीन सागर से लेकर ताइवान जलडमरूमध्य तक उसकी सक्रियता ने अमेरिका और उसके सहयोगियों को चिंतित किया है। इसी संदर्भ में “क्वाड” जैसे मंचों का महत्व बढ़ा है, जिसमें भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया शामिल हैं। क्वाड को कई विश्लेषक इंडो-पैसिफिक में एक संतुलनकारी मंच के रूप में देखते हैं, हालांकि भारत आधिकारिक रूप से इसे किसी सैन्य गठबंधन के रूप में नहीं प्रस्तुत करता।

लेकिन यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि भारत केवल पश्चिमी गठबंधनों तक सीमित नहीं है। वह शंघाई सहयोग संगठन का सदस्य है, जहां चीन और रूस दोनों प्रमुख भूमिका निभाते हैं। इसके अलावा ब्रिक्स समूह में भी भारत सक्रिय है, जो वैश्विक वित्तीय व्यवस्था में सुधार और विकासशील देशों के सहयोग को बढ़ाने की दिशा में काम कर रहा है। इन सभी मंचों में एक साथ सक्रिय रहना भारत की बहु-आयामी कूटनीति का उदाहरण है। किंतु यही बहु-आयामी नीति कभी-कभी संतुलन की कठिन परीक्षा भी बन जाती है, क्योंकि चीन के साथ सीमा विवाद और अमेरिका के साथ बढ़ते रणनीतिक सहयोग के बीच संतुलन बनाए रखना आसान नहीं है।

अमेरिका की व्यापार नीति में बढ़ती अनिश्चितता ने भी भारत के लिए नई चुनौतियां पैदा की हैं। पिछले कुछ वर्षों में संरक्षणवाद और टैरिफ युद्धों की प्रवृत्ति फिर से उभरती दिखाई दी है। यदि वैश्विक व्यापार व्यवस्था में अस्थिरता बढ़ती है, तो भारत जैसे निर्यात-उन्मुख क्षेत्रों के लिए इसका प्रभाव गंभीर हो सकता है। इसी संदर्भ में भारत और यूरोपीय संघ के बीच मुक्त व्यापार समझौते की दिशा में हुई प्रगति महत्वपूर्ण है। भारत और यूरोपीय संघ के बीच व्यापार पहले ही 120 अरब यूरो से अधिक का हो चुका है और यदि व्यापक व्यापार समझौता लागू होता है, तो यह दोनों पक्षों के लिए आर्थिक अवसरों का नया द्वार खोल सकता है। यूरोप वर्तमान समय में रणनीतिक विविधीकरण की नीति अपना रहा है और एशिया में विश्वसनीय साझेदारों की तलाश कर रहा है। भारत के लिए यह अवसर है कि वह निवेश, प्रौद्योगिकी और हरित ऊर्जा सहयोग के क्षेत्रों में यूरोप के साथ अपने संबंधों को और गहरा करे।

हालांकि यूरोप के साथ बढ़ते आर्थिक संबंधों के साथ एक महत्वपूर्ण राजनीतिक आयाम भी जुड़ा हुआ है। यूरोपीय देश व्यापार और मानवाधिकार के मुद्दों को अक्सर अलग-अलग नहीं देखते। लोकतांत्रिक संस्थाओं की मजबूती, न्यायपालिका की स्वतंत्रता, प्रेस की स्वतंत्रता और अल्पसंख्यकों के अधिकार जैसे प्रश्न यूरोपीय नीति-निर्माताओं के लिए महत्वपूर्ण होते हैं। इसलिए भारत के लिए यह आवश्यक है कि वह अपने घरेलू लोकतांत्रिक ढांचे को मजबूत बनाए रखे, क्योंकि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उसकी साख काफी हद तक उसके लोकतांत्रिक मूल्यों से जुड़ी हुई है।

भारत की विदेश नीति का एक और महत्वपूर्ण आयाम “वैश्विक दक्षिण” का नेतृत्व है। जी20 की अध्यक्षता के दौरान भारत ने विकासशील देशों की आवाज़ को प्रमुखता देने की बात कही थी। अफ्रीकी संघ को जी20 की सदस्यता दिलाने का निर्णय इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम था। लेकिन वैश्विक दक्षिण का नेतृत्व केवल कूटनीतिक घोषणाओं से नहीं बल्कि ठोस नीतिगत पहल से तय होता है। संयुक्त राष्ट्र और विश्व खाद्य कार्यक्रम के अनुसार दुनिया के करोड़ों लोग अभी भी खाद्य असुरक्षा से जूझ रहे हैं। अफ्रीका, पश्चिम एशिया और दक्षिण एशिया के कई हिस्सों में जलवायु परिवर्तन, संघर्ष और आर्थिक अस्थिरता के कारण मानवीय संकट गहरा रहा है। यदि भारत वास्तव में वैश्विक दक्षिण का प्रतिनिधित्व करना चाहता है, तो उसे विकास सहयोग, जलवायु वित्त, तकनीकी साझेदारी और मानवीय सहायता के क्षेत्रों में अधिक सक्रिय भूमिका निभानी होगी।

भारत ने पिछले वर्षों में अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन, आपदा-रोधी अवसंरचना गठबंधन और डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना जैसे कई वैश्विक पहल शुरू किए हैं। ये पहल इस बात का संकेत देती हैं कि भारत केवल राजनीतिक बयानबाज़ी तक सीमित नहीं रहना चाहता, बल्कि वैश्विक समस्याओं के व्यावहारिक समाधान में भी योगदान देना चाहता है। लेकिन इन पहलों की विश्वसनीयता तभी मजबूत होगी जब भारत अंतरराष्ट्रीय कानून, संप्रभुता और मानवीय मूल्यों के प्रश्नों पर भी एक सुसंगत और स्पष्ट आवाज़ बनाए रखे।

विदेश नीति में यह संतुलन अत्यंत जटिल होता है। एक ओर राष्ट्रीय हितों की रक्षा की व्यावहारिक आवश्यकता होती है, दूसरी ओर अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा और नैतिक विश्वसनीयता का प्रश्न भी उतना ही महत्वपूर्ण होता है। भारत जैसे बड़े लोकतंत्र से यह अपेक्षा की जाती है कि वह केवल शक्ति-संतुलन की राजनीति में भागीदार न बने, बल्कि एक जिम्मेदार वैश्विक अभिनेता के रूप में भी सामने आए। जब वह अंतरराष्ट्रीय मंचों पर शांति, बहुपक्षवाद और नियम-आधारित व्यवस्था की बात करता है, तो दुनिया यह भी देखती है कि संकट की घड़ी में उसकी प्रतिक्रिया कैसी होती है।

2026 का वर्ष इसलिए भारत के लिए निर्णायक साबित हो सकता है। एक ओर उसके पास अभूतपूर्व अवसर हैं—तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था, युवा जनसंख्या, तकनीकी क्षमता और वैश्विक मंचों पर बढ़ता प्रभाव। दूसरी ओर चुनौतियां भी उतनी ही गंभीर हैं—सीमा विवाद, क्षेत्रीय अस्थिरता, वैश्विक शक्ति प्रतिस्पर्धा और जलवायु संकट जैसी समस्याएं। यदि भारत इन चुनौतियों के बीच संतुलित, दूरदर्शी और सिद्धांत-आधारित विदेश नीति अपनाता है, तो वह आने वाले वर्षों में वास्तव में एक वैश्विक नेतृत्वकारी भूमिका निभा सकता है।

अंततः किसी भी राष्ट्र की विदेश नीति केवल सरकार की रणनीति नहीं होती, बल्कि वह उस देश की सभ्यता, मूल्यों और दीर्घकालिक दृष्टि का भी प्रतिबिंब होती है। भारत की सभ्यता ने सदियों से सहअस्तित्व, संवाद और संतुलन की परंपरा को महत्व दिया है। आज जब विश्व व्यवस्था अस्थिरता और प्रतिस्पर्धा के दौर से गुजर रही है, तब भारत के पास यह अवसर है कि वह अपनी कूटनीति के माध्यम से इन मूल्यों को आधुनिक वैश्विक राजनीति में रूपांतरित करे। यही वह मार्ग है जो भारत को केवल एक बड़ी अर्थव्यवस्था नहीं बल्कि एक जिम्मेदार और विश्वसनीय वैश्विक शक्ति के रूप में स्थापित कर सकता है।

— डॉ. शैलेश शुक्ला

डॉ. शैलेश शुक्ला

राजभाषा अधिकारी एनएमडीसी [भारत सरकार का एक उपक्रम] प्रशासनिक कार्यालय, डीआईओएम, दोणीमलै टाउनशिप जिला बेल्लारी - 583118 मो.-8759411563