सपनों के अपने
मेरे सपनों को ऐसे मरोड़ा गया,
जब हम उड़ने के कगार पर थे,
तब मुझे तोड़ा गया..!!,
दर्द ऐसा की हम सह भी नहीं सकते,
और सामने लोग वो,
जिन्हें कुछ कह भी नहीं सकते
फिर भी मुझे पता था,
ज़ख्म अपनों ने दिया है,
तो उपचार भी अपने देंगे,
पर मुझे क्या पता था,
वो अपना आत्मसम्मान खो देंगे,
ज़ख्म पर मरहम
की जगह नमक छिड़क कर
अपना ईमान खो देंगे..!!
मेरे सपनों को, मेरे अपनों ने मरोड़ा है,
मेरे दोनों पैर तोड़कर ,
मुझे लम्बी रेस के लिए छोड़ा है!
— प्रशांत अवस्थी “रावेन्द्र भैय्या”
