लहज़े की मिठास और क़िरदार की बुलंदी
इंसानी ताल्लुक़ात (रिश्ते) बहुत नाज़ुक होते हैं। कभी-कभी लाख कोशिशों के बावजूद रिश्तों में वह गर्माहट नहीं रहती और कड़वाहट घर कर लेती है। ऐसे मोड़ जब ताल्लुक़ात ख़राब हो जाएँ, तो ख़ामोशी अख़्तियार कर लेनी चाहिए।
ख़ामोशी,एक मज़बूत ढाल है,जब बातचीत में तल्ख़ी (कड़वाहट) बढ़ जाए, तो अक्सर इंसान गुस्से में ऐसी बातें कह जाता है जो ताउम्र के लिए ज़ख्म बन जाती हैं। जो लोग बा-वकार (इज्ज़तदार) होते हैं, वे जानते हैं कि ख़ामोशी का मतलब हार मान लेना नहीं, बल्कि अपनी और सामने वाले की साख़ को बचाना है। चीखने-चिल्लाने से मसले हल नहीं होते, बल्कि और उलझ जाते हैं।
ज़ाती हमले और ख़ानदानी शराफ़त ज़रूरी है,
सबसे ख़ूबसूरत बात यह है कि “ख़ानदानी लोग बात को ज़ातियात तक नहीं ले जाते।” एक ऊंचे किरदार और अच्छी तरबियत (परवरिश) की पहचान यही है कि वह झगड़े के दौरान भी अपनी तहज़ीब का दामन नहीं छोड़ता।आज के दौर में हम देखते हैं कि जैसे ही रिश्ता टूटता है, लोग एक-दूसरे के राज़ फ़ाश करने लगते हैं या निज़ी हमले शुरू कर देते हैं। लेकिन एक बा-ज़र्फ़ (बड़े दिल वाला) इंसान वह है जो अलग होते वक़्त भी अपनी मर्यादा का ख्याल रखे।
इज़्ज़त के साथ किनाराकशी या पीछे हट जाना कभी-कभी बुज़दिली नहीं, बल्कि बहुत बड़ी बहादुरी होती है। इज़्ज़त से पीछे हट जाना बेहतर होता हैं,यह वाक्य हमें सिखाता है कि अगर किसी जगह आपकी क़द्र न हो या रिश्ता बोझ बन जाए, तो वहां से गरिमा के साथ निकल जाना ही बेहतर है। लड़कर या कीचड़ उछालकर अलग होने से इंसान अपनी ख़ुद की नज़र में गिर जाता है।
तरबियत और क़िरदार का इम्तिहान होता है,
रिश्ते निभाते वक्त तो हर कोई अच्छा होता है, लेकिन असली क़िरदार और तरबियत का पता तब चलता है जब रिश्ता टूट रहा हो। मुश्किल वक्त में आप अपना आपा नहीं खोते और अपनी परवरिश की लाज रखते हैं, यही आपकी असल जीत है।
रिश्ते का ख़त्म होना दुखद हो सकता है, लेकिन इंसानियत का ख़त्म होना उससे भी बड़ी त्रासदी है। अपनी ज़ुबान को कड़वाहट से पाक रखना और दूसरों की इज़्ज़त का ख़्याल रखना ही एक बा-शऊर (समझदार) इंसान की पहचान है।
”लहज़े की मिठास और क़िरदार की बुलंदी इंसान को कभी हारने नहीं देती।”
— डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह
