अपने अज़ीज़ों को अपना वक्त अता कीजिए
इंसानी ज़िंदगी के इस तवील सफ़र में हम अक्सर कीमती अशियां और दुनियावी माल-ओ-ज़र को ही सबसे बड़ा तोहफ़ा तसव्वुर कर बैठते हैं, मगर हक़ीक़त के आईने में देखा जाए तो रूह को सुकून देने वाले तोहफ़े बाज़ार में दस्तयाब नहीं होते। अगर आप वाक़ई किसी को अपनी ज़िंदगी का सबसे नायाब और क़ीमती अक्स देना चाहते हैं, तो उसे दुआ दीजिए, क्योंकि दुआ महज़ लफ़्ज़ों का मजमुआ नहीं बल्कि एक ऐसी रूहानी ढाल है जो आने वाली हर बला और मुश्किल के सामने एक फ़ौलादी दीवार बनकर खड़ी हो जाती है और इंसान को ज़माने के गर्म थपेड़ों से महफूज़ रखती है। इसके साथ ही अपने अज़ीज़ों को अपना वक्त अता कीजिए, क्योंकि आज के इस मसरूफ़ीयत भरे दौर में किसी को अपना कीमती लम्हा देना दरअसल उसे अपनी ज़िंदगी का एक हिस्सा देना है, और यही वो वक्त है जो बेजान पड़ते रिश्तों को गहराई और नई ज़िंदगी बख़्शता है। रिश्तों की इमारत को अगर ताउम्र कायम रखना है तो उसे भरोसे की ईंटों से तामीर कीजिए, क्योंकि यक़ीन और एतबार वो मज़बूत बुनियाद है जिसके बिना मोहब्बत का वजूद भी बिख़र जाता है। इन सबके दरमियान ईमानदारी का दामन थामे रखना निहायत ज़रूरी है, क्योंकि सच्चाई ही वो पाकीज़ा जज़्बा है जो रिश्तों को सादगी के साथ उम्र भर ज़िंदा और तरोताज़ा रखता है। याद रखिए कि दुनिया के तमाम रंगीन और आलीशान तोहफ़े वक्त की गर्द (धूल) जमते ही फ़ीके पड़ जाते हैं और अपनी चमक खो देते हैं, मगर दुआ, वक्त, भरोसा और ईमानदारी ये वो चार अनमोल रत्न हैं जो इंसान के दिल के निहांखाने में हमेशा ख़ामोशी से महकते रहते हैं और रूह को एक रब्बानी सुकून अता करते हैं।
किसी के हक़ में दुआएँ तमाम लिख देना,
सुकून-ए-कल्ब का ऊँचा मुकाम लिख देना।
जो वक्त दोगे तो रिश्तों में जान आएगी,
वफ़ा की राह में अपना भी नाम लिख देना।
यकीं की नींव पे क़ायम रहे मुहब्बत भी,
तमाम उम्र का ये एतराम लिख देना।
सच्चाई महकेगी ताउम्र सादगी बनकर,
खुलूस-ए-दिल से हकीकत का जाम लिख देना।
— डॉ. मुश्ताक अहमद शाह
