ज़माने की भीड़ में अकेला
इतनी भीड़ बढ़ रही है इस ज़माने में,
लोग उतने ही अकेले होते जा रहे हैं।
चेहरों का मेला ‘हर मोड़’ पर सजा है,
दिल अपने ही साये से डरे जा रहे हैं।
हँसी अब ‘तस्वीरों’ में सीमित रह गई,
बातें स्क्रीन तक ‘सिमटते’ जा रही है।
भीड़ में चलके भी कोई साथ में नहीं,
रिश्तों की डोर ढीली पड़ते जा रही है।
हर कोई मगन है अपनी उस दुनिया में,
ये वक़्त हाथों से फिसलता जा रहा है।
पास बैठकर भी इतनी दूरियाँ बढ़ गईं,
कि ‘अपनापन’ कहीं खोता जा रहा है।
भीड़ के इस शोर में एक सन्नाटा-सा है,
जो अन्दर ही अन्दर गूंजता जा रहा है।
जितनी भीड़ बढ़ रही है इस ज़माने में,
इंसान खुद से ही ‘दूर’ होता जा रहा है।
— संजय एम तराणेकर
