संरक्षित जल, सुरक्षित कल : जल गंगा संवर्धन अभियान
जलगंगा संवर्धन अभियान चल रहा है | जल गंगा संवर्धन अभियान में महत्वपूर्ण जल स्रोतों के संरक्षण के लिए प्रयास कर इस अभियान में नदियों के उद्गम स्थलों के संरक्षण के बारे में जन जागरूकता बढ़ाने की आवश्यकता है | नर्मदा नदी के दोनों ओर दो किलोमीटर के क्षेत्र में किसानों को ऑर्गेनिक खेती के लिए प्रोत्साहित किया जाना आवश्यक है | कुओं, तालाबों, बावड़ियों आदि जल स्रोतों की स्वच्छता एवं संरक्षण के लिए स्थानीय जनता के सहयोग की भी दरकार है | प्रदेश में जल एवं जल स्त्रोतों के संरक्षण की दिशा में संरक्षित जल, सुरक्षित कल की महत्वपूर्ण पहल प्रशंसनीय है | देखा जाए तो कई क्षेत्रों में पानी की कमी दिखाई देती है जैसे बेंगलुरु में जलस्तर घट गया है।सुझाव है कि जल व्यर्थ ना बहावे।बल्कि जल को बचाया जा सके ऐसा उपाय करें ।जल की कमी से सारे कार्य रुक जाते है।देश भर में राष्ट्रीय जल पुरस्कार 2022 मध्य प्रदेश को प्रथम स्थान मिला था।जल संसाधनों के संरक्षण एवं संवर्धन के प्रयास, पानी की नीति, सिंचाई के लिए माइक्रो इरीगेशन तकनीकी का प्रयोग,नई माइक्रो इरीगेशन परियोजनाओं का क्रियान्वयन, जल उपयोग की दक्षता,जल-संरचनाओं का पुनरुद्धार, सीवेज एवं औद्योगिक अपशिष्ट पानी को उपचारित कर पुनः उपयोग आदि क्षेत्रों में किए प्रयासों व उपलब्धियों के लिए मिला था।नदियो व अन्य जल संरचना यथा तालाब, झील, कुआ, बावड़ी आदि हमारी संस्कृति व परंपरा मे पूजा के स्थल रहे है, इनकी अनुपलब्धता या दूषित होने पर हेंड पम्प व नलकूप की पूजा करके भी परंपरा का निर्वाह किया जाता रहा है लेकिन प्राकृतिक जल संसाधनों के रख-रखाव के प्रति समुचित जिम्मेदारी का अभाव सा ही रहा है।जल संरक्षण के जरिये हम पूरी तरह स्थानीय स्तर पर आत्मनिर्भर बन सकते है। उल्लेखनीय है कि माननीय मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव जी ने इस संबंध में जनप्रतिनिधियों से भी अपील की है।उन्होंने कहा कि जन सामान्य के लिए ग्रीष्म ऋतु में प्याऊ लगवाने की परंपरा प्राचीन काल से रही है। जल संरक्षण के साथ-साथ जल की सहज उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए यह व्यवस्था आवश्यक है। माननीय मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव जी ने मीडिया को दिए संदेश के माध्यम से प्रदेशवासियों से “जल गंगा अभियान” के अंतर्गत बूंद- बूंद जल बचाने के लिए संचालित होने वाली गतिविधियों में सहभागिता करने का भी आह्वान किया।जो की प्रशंसनीय पहल है|
दूसरे पहलू की और तनिक झांके तो दम तोड़ते झरनों को बचाने में जुटी सरकार,1931 झरने हुए पुनर्जीवित जल संरक्षण के अंतर्गत हिमालयी क्षेत्र के आधे से अधिक बारहमासी झरनों के सूखने पर नीति आयोग ने जताई चिंता जताई थी | इससे चिंतनीय प्रश्न खड़े हुए।उल्लेखनीय है कि देश में पहली बार होगी झरनों की गिनती की खबर सुर्खियों में आई थी।जल स्त्रोतों की गणना में झरनों की गणना से एक नई दिशा कलकल के स्वर के साथ प्राप्त होगी।जो जल के अभाव में सूखे पड़े हुए थे।वर्तमान में जीवित झरने एवं मृत झरने भी गणना से आकड़े को देखे तो देश में कुल चिन्हित झरने 4327 है जिनमें से1931 झरनों को पुनर्जीवित किया गया। जो अनुपात के हिसाब से कम ही है। मध्यप्रदेश में भी कई पर्वत मालाएं है।जिनमे भी बरसात में झरने दिखाई देते है।उनके दर्शन हेतु लोग जाकर झरनों का आनन्द लेते है।राज्यों की सूची में मप्र के नाम भी जोड़ा जाना चाहिए। ताकि जो मृत झरने है उन्हें भी पुनर्जीवित किया जा सकें।पहाड़ी झरनों के ऊपर कही कही जो नदी,नाले के प्रवाह है उसमें रुकावट नही होनी चाहिए|तभी झरने बारिश के मौसम के अलावा अन्य मौसम में भी दर्शनीय होंगे| क्योकि नदियां यदि प्रवाहमान है तो पहाड़ क्षेत्रों में बहने वाले झरनों की वजह से।झरने देखने लायक होते हैं। चाहे वे कम ऊंचाई वाले हों|झरनों में कुछ ऐसा आकर्षण होता है जो ध्यान अपनी ओर खींच लेता है|जब झरने का पानी का सीधे नीचे गिरता हुआ पानी के पीछे की चट्टान की सतह से संपर्क बनाता है जो जीवित होने का प्रतीक होता है।झरना नदी या नाले में कोई भी बिंदु होता है जहाँ पानी एक ऊर्ध्वाधर बूंद या खड़ी बूंदों की एक श्रृंखला के ऊपर से बहता है।खैर ,म प्र शासन नदियों के जल गंगा संवर्धन अभियान 19 मार्च से , 2026 संग झरनों की कायाकल्प कर उन्हें पुनर्जीवित करें तो ये भागीरथी प्रयास से मप्र एक सौगात के रूप में पर्यटकों को प्राप्त होगा|
देखा जाए तो मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में यूं तो कई वृहद ,मध्यम जल परियोजनाएं निर्मित है|एवं लघु तालाब भी निर्मित है | पक्षीयों का ज्यादा संख्या में एक साथ आना और बड़ी जल परियोजनाओं के तटों पर जल,एवं आहार मिल जाता है |किंतु जब सूखा या अल्प वर्षा की स्थिति निर्मित हो तो अभ्यारणों में कृत्रिम जल संरचनाएं जगह- जगह ज्यादा संख्या में निर्मित किया जाना चाहिए | ताकि उनमे जल बाहर से लाकर भरकर गर्मी में पक्षियों और वन्य जीवों को सुलभता से प्राप्त हो सके | और प्यास के कारण उनको मरने से बचाया जा सके |क्योकि पृथ्वी रहने का जितना अधिकार इंसानों का है उतना अधिकार पशु -पक्षियों का भी है । एक जानकारी के मुताबिक यदि १०० क्यूबिक से.मी. जल में एक कोलीफार्म बैक्टीरिया हो तो जल दूषित माना जाता है। जल बोर्ड को भी चाहिए की इस प्रदूषण को रोकने में अपना दायित्व निभाए |राज्य में बहने वाली कुछ नदियों को पुनर्जीवित करने का प्रयास किया जा गया था। सभी राज्य अपने क्षेत्र मे बहने वाली नदियों के शुद्धिकरण का प्रयास करे तो देश की मुख्य पवित्र नदियों स्वच्छ हो कर देश के लोगों को स्वस्थता प्रदान अवश्य करेगी।स्वस्थ जीवन के लिए स्वच्छ जल का होना आवश्यक होता है ,अस्वच्छ जल से कई बीमारिया उत्पन्न होती है जिनसे उभरने हेतु इन्सान आर्थिक रूप से कमजोर हो जाता है | जिस तरह से आबादी बढ़ रही है उसका प्रभाव हमारे जल प्राप्ति के संसाधनों पर पड़ता देखा जा सकता है |फलस्वरूप पेयजल मे प्रतिवर्ष कमी होती दिखाई देने लगी है इसका प्रमाण बाजारों मे बंद बोतलों पानी बिकता है।यह भी सच है की जल की मात्रा का आकलन जनसंख्या मे बांटने से पेयजल – घरेलु वापरने,औद्योगिक ,अन्य उपयोग (सिंचाई को छोड़कर )असंतुलित हुआ है।हालांकि योजना बनाते समय तकनीकी गणना के आधार पर पानी की मात्रा का आकलन किया जाता है किन्तु नई योजना बनने की गति धीमी और जनसंख्या बढ़ने की गति ज्यादा होने से ये असंतुलन पनपता है।
जीवन के लिए स्वच्छ जल का होना आवश्यक होता है ,अस्वच्छ जल से कई बीमारिया उत्पन्न होती है जिनसे उभरने हेतु इन्सान आर्थिक रूप से कमजोर हो जाता है | जिस तरह से आबादी बढ़ रही है उसका प्रभाव हमारे जल प्राप्ति के संसाधनों पर पड़ता देखा जा सकता है |फलस्वरूप पेयजल मे प्रतिवर्ष कमी होती दिखाई देने लगी है इसका प्रमाण बाजारों मे बंद बोतलों एवम पाउच मे पानी बिकता है | यह भी सच है की जल की मात्रा का आकलन जनसंख्या मे बाटने से पेयजल – घरेलु वापरने /ओद्योगिक /अन्य उपयोग (सिचाई को छोड़कर ) से असंतुलित हुवा है | हालाकि योजना बनाते समय तकनिकी गणना के आधार पर पानी की मात्रा का आकलन किया जाता है किन्तु नई योजना बनने की गति धीमी और जनसंख्या बढ़ने की गति ज्यादा होने से ये असंतुलन पनपता है | ओद्योगिक क्षेत्र के समीप बहने वाले नदिया ,तालाब,झील का जल भी प्रदूषित होता है | कई शहरो /गावों के गंदे पानी के नालों को इनके समीप बहने वाली नदियों मे मिलते हुए देख सकते है | गंदे पानी को नदियों मे प्रवाहित होने बचाना चाहिए |उदाहरण के तोर पर यदि गंगा नदी बात करे तो उदगम से सागर तक मे समाहित होने के २५२५ कि.मी.तक में इस पवित्र नदी के जल में भारी मात्रा मे मल युक्त गन्दा पानी,रासायनिक अपशिष्टों ,घाटों पर जलाये जाने वाले शवों की हजारों टन राख प्रवाहित होने के साथ कचरा भी डाला जाता है |गंगा के शुद्धिकरण अभियान चलते हुए वर्षो हो गए फिर भी स्थिति ज्यों की त्यों है |
गंगा शुद्धिकरण पर वर्तमान में जो उपाय किये जारहे है उन की गति धीमी है | कुंभ,के मेले में देश के विभिन्न प्रान्तों से आये श्रद्धालु इस जल में स्नान व आचमन करते है तो बड़ा दुःख होता है | कहते है की गंगा का जल वर्षों तक ख़राब नहीं होता है ये उस की स्वाभाविक प्रवृत्ति है| एवं अन्य पावन नदियों में धार्मिक कार्य करते आ रहे है | इन्सान ही है की इन पवित्र नदियों को प्रदूषित करने पर तुला हुआ है | एक जानकारी के मुताबिक यदि १०० क्यूबिक से.मी. जल में एक कोलीफार्म बैक्टीरिया हो तो जल दूषित माना जाता है लोगों को भी चाहिए जल प्रदूषण को रोकने में अपना दायित्व निभाए | राज्य में बहने वाली कुछ नदियों को पुनर्जीवित करने का प्रयास म.प्र. सरकार द्वारा किया जा रहा है यदि सभी राज्य अपने क्षेत्र में बहने वाली नदियों के शुद्धिकरण का प्रयास करे तो देश की मुख्य पवित्र नदियों की स्वच्छता साझा प्रयासों से स्वच्छ हो कर देश के लोगों को स्वस्थता प्रदान अवश्य करेगी साथ ही देश के हितो मे साँझा विचारों को समाधान हेतु एक नया बल प्राप्त होगा|
— संजय वर्मा ‘दृष्टि’
