देहमय समय
सब कुछ देहमय हो गया है अब,
हवा में एक ही गंध तैरती है—
आकर्षण, उपभोग और अधूरी तृष्णा।
बाज़ार की हर रोशनी
इच्छाओं का मूल्य तय करती है,
और मनुष्य
धीरे-धीरे वस्तु में बदलता जाता है।
प्रेम अब अनुभूति नहीं,
एक अभ्यास-सा लगता है,
जिसे सीखा और दिखाया जाता है।
भीतर कहीं
संवेदनाएँ सूख रही हैं—
जैसे धरती बिना वर्षा के।
और हम
इसे ही प्रगति कहकर
तालियाँ बजा रहे हैं।
— डॉ. सत्यवान सौरभ
