उलझनों की भीड़ में कहीं खो गयी है ज़िन्दगी
सन्नाटों में उलझे विचार
हर मोड़ पर सवाल खड़े होते हैं
राहें गुम होती हैं, मंज़िल दूर है
कदम थकते हैं, मन ढ़लता है
भीड़ की चुप्पियों में
खुद की आवाज़ कहीं दब जाती है
हर खिड़की से झाँकती उम्मीद
धीरे-धीरे फुसफुसाती है
सपनों की धुंधली रोशनी
पलकों पर छुपी मुस्कान में बसी है
अनजानी राहों में बिखरे निशान
स्मृतियों की हल्की गूँज ले आते हैं
हर सवाल का जवाब ढूँढते कदम
धड़कनों की धुन के साथ चलते हैं
भटकी हुई आँखों में चमक
फिर भी आशा की किरण जगाती है
वो खोई हुई हँसी
वो अधूरी बातें
भीड़ में गुम हुई यादें
धीरे-धीरे लौटती हैं
मन की परतों में छुपी खुशी
हर दर्द के बीच खिलती है
उलझनों की भीड़ में भी
ज़िन्दगी की मिठास बनी रहती है
छोटे-छोटे लम्हों में
खुशियों की किरण झलकती है
हर अँधेरे को पार कर
नई उम्मीद उभरती है
दिल की गहराई में बसी आवाज़
धीरे-धीरे राह दिखाती है
ज़िन्दगी की राह में
हर चुनौती भी एक सिख देती है
उलझनों की भीड़ में कहीं खो गयी है ज़िन्दगी
पर हर मोड़ पर नयी रोशनी खिलती है
आशा, प्यार और हिम्मत के संग
हम फिर भी आगे बढ़ते हैं
— डॉ. अशोक
