स्त्रीधन
स्त्री को धन क्यों ? कहा जाता यह सवाल काफी दिनो से मेरे जेहन में चल रहा । साथ ही एक और सवाल जन्म ले रहा है -स्त्री धन है या इंसान ? चाहे समाज हो या साहित्य, चाहे इतिहास हो या राजनीतिक या हो परिवार हर कहीं स्त्री को थन के रूप में स्थापित किया गया है ।अगर किसी के घर में बेटी पैदा होती है तो कहते है लक्ष्मी आई है और अगर किसी के घर में बहु का आगमन होता है तो कहते है लक्ष्मी आई है। लड़की जिस घर में पैदा होती या शादी के बाद जिस घर में जाती है उसे धन ही कहा जाता ।कही भी उसे इंसान नही माना गया है।
लडकियो को हमेशा जिम्मेदारी ही समझा और समझाया गया है ,कभी भी उसे भरण- पोषणकर्ता नहीं माना गया है।जबकी हकीकत तो ये है कि एक स्त्री एक साथ कई जीवन का पोषण करती और उसके संचालन से एक घर पूरा घर संचालित होता है ,चूंकि इस प्रकिया में उसे ज्यादा महत्व न मिल जाय उसके लिए उसे गहने,कपड़ो और खूबसूरती के मकड़जाल में फंसाया गया है।स्त्री उस मकड़जाल से कभी मुक्त नहीं हो पाए इसका पुख्ता व्यवस्था किया गया है कि उसे शिक्षा से दूर और धर्म के करीब रखा गया है ।स्त्री को धार्मिक और सामाजिक रीति-रिवाज और कर्मकांड में इस तरह उलझाया गया है कि वह इस से परे वो कुछ सोच ही नहीं पाती है। अगर कोई स्त्री पुरुष प्रधान समाज द्वारा बनाए व्यवस्था के विरुद्ध आवाज भी उठाए तो उसे चरित्रहीन, कुलटा और चुड़ैल कहा जाता है।
सम्पूर्ण मानव समाज में स्त्री को देवी या वस्तु के रूप में स्थापित किया गया किसी भी समाज में उसे इंसान का दर्जा नहीं दिया गया है चाहे वो कितना ही उन्नत समाज क्यो न हो ! तभी तो प्रचीन काल से लेकर आधुनिक काल तक स्त्रियाँ सम्पति के तौर पर मानी जाती है और उसी तरह रखी जाती है।धीरे – धीरे स्त्री ने भी अपने को वही मान लिया है। लेकिन सच्चाई तो यह है कि पुरुष की तरह स्त्री भी एक इंसान है वो कोई धन सम्पति नहीं.
— विभा कुमारी “नीरजा”
