है दिल्ली दरबार बिकाऊ
तेल, तेल की धार बिकाऊ,
जीत बिकाऊ,हार बिकाऊ,
नीले ड्रम को भूल गए क्या,
है दुनिया में प्यार बिकाऊ।
बदले युग में यार बिकाऊ,
निर्धन की पतवार बिकाऊ,
बस,जितनी औकात है जिसकी
चाहो तो संसार बिकाऊ।
पूरब में आधार बिकाऊ,
पश्चिम में गद्दार बिकाऊ,
वोट बिक रहे हैं बोतल पर
बस्ती और जंवार बिकाऊ।
होते खेवनहार बिकाऊ,
जज या तहसीलदार बिकाऊ,
धर्म बिक रहा चौराहे पर
है अब्दुल-गफ्फार बिकाऊ।
कहते हैं सरकार बिकाऊ,
पुरस्कार का सार बिकाऊ,
यूजीसी कानून बना तो
लागे चौकीदार बिकाऊ।
प्रवचन का व्यापार बिकाऊ,
है गीता का सार बिकाऊ,
माया कहते हैं जो धन को
युगकवि बना कुमार बिकाऊ।
संत बिकाऊ,कंत बिकाऊ,
साधू और महंत बिकाऊ,
मुक्त कहें जो खुद को बाबा
नेता-सा व्यवहार बिकाऊ।
पुण्य बिकाऊ,पाप बिकाऊ,
पैसा हो तो बाप बिकाऊ,
चूरन देना आता हो तो –
भर-भर लाली पॉप बिकाऊ।
नेह बिकाऊ, गेह बिकाऊ,
नाम कला का,देह बिकाऊ,
स्वार्थ परस्ती की हद देखो
मौला और विदेह बिकाऊ।
साहित्यिक सम्मान बिकाऊ,
नेता का ईमान बिकाऊ,
जब से गुरुकुल बंद हो गए
कोचिंग घर में ज्ञान बिकाऊ।
आम बिकाऊ,खास बिकाऊ,
मस्ती या उल्लास बिकाऊ,
भले महीना तपिश जेठ का
शहरों में मधुमास बिकाऊ।
— सुरेश मिश्र
