ग़ज़ल
अपनों से ही खाकर धोखा तड़पी है ये जान बहुत
मैंने अपने भोलेपन में भुगते हैं नुकसान बहुत
यूँ ही नहीं मेरे दिल से उठते हैं शोले रह-रहकर
जिम्मेदारियों की भट्ठी में सुलगे हैं अरमान बहुत
पूछ रहा है आखिरी ख्वाहिश मुझको मारने से पहले
ए ज़ालिम मुझ पर तेरा इतना ही है अहसान बहुत
सच्ची बात कहो कोई चाहे सुनने में कड़वी हो
अच्छी बातें सुन-सुनकर तो पक गए हैं अब कान बहुत
आज जहां गुमनाम ज़िंदगी जीने को मजबूर हूँ मैं
कभी हुआ करती थी उस बस्ती में मेरी शान बहुत
— भरत मल्होत्रा
