कविता

साइड लोअर मेरा प्रिय

कभी-कभी साइड लोअर बर्थ पर
वो चुपके से आ जाता है,
बिन कहे ही मेरे पास बैठ
मुझको मुझसे चुरा जाता है।

नदी, पोखर, खेत, किनारे
सब उसके तराने लगते हैं,
उसकी बाहों में बीते क्षण
मुझको सपनों-से सुहाने लगते हैं।

पटरी पर सरपट चलती धड़कन,
उसका ही मधुर संदेश लगे,
हर कंपन, हर हलचल में
उसका लगाव विशेष लगे।

जब पुल से होकर गुजरता है,
वो गहरा-सा स्वर गूंजे कहीं,
जैसे मेरे ही उर की धड़कन
उसके उर से हो मिली वहीं।

अनजान से छोटे स्टेशन पर
जब क्षण भर को ठहर जाता है,
जैसे रूठा कोई प्रिय मिलकर
फिर चुपके से बिखर जाता है।

भीड़ भरे उस कोलाहल में
वो केवल मुझको तकता है,
मेरी हर चुप, हर आहट को
अपनी बाँहों में रखता है।

यादें, वेदना, मीठी कसक
सब उसकी आँखों में तैरें,
उसकी खिड़की से झाँकूँ जब
अपने ही भावों से वो घेरें।

मिलन भी है, विरह भी इसमें,
कैसा ये अनोखा नाता है,
पास रहे तो मन बहलाए,
छूटे तो मन तड़प जाता है।

न जाने क्यों हर इक सफ़र में
वो मुझको यूँ भा जाता है,
रेल नहीं वो—मेरा प्रिय है,
जो मुझमें ही बस जाता है।

साइड लोअर की उस दुनिया में
जब भी मैं खो जाती हूँ,
उसके संग चलती-चलती
मैं खुद में ही समा जाती हूँ।

— सविता सिंह मीरा

*सविता सिंह 'मीरा'

जन्म तिथि -23 सितंबर शिक्षा- स्नातकोत्तर साहित्यिक गतिविधियां - विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित व्यवसाय - निजी संस्थान में कार्यरत झारखंड जमशेदपुर संपर्क संख्या - 9430776517 ई - मेल - meerajsr2309@gmail.com