पर्यावरण

यूं ही नहीं कोई शहर इंदौर हो जाता

मार्च के अंतिम दिनों में जब मुझे साहित्य अकादमी मध्य प्रदेश द्वारा आयोजित साहित्यिक पत्र–पत्रिकाओं के सम्मेलन में भाग लेने के लिए इंदौर आने का अवसर मिला, तब यह यात्रा केवल एक औपचारिक अकादमिक उपस्थिति भर नहीं रही, बल्कि वह अनुभव बन गई जिसने एक शहर के चरित्र, संस्कृति, अनुशासन और नागरिक चेतना को निकट से देखने–समझने का अवसर प्रदान किया। सम्मेलन का आयोजन देवी अहिल्याबाई विश्वविद्यालय के विशाल और सुव्यवस्थित परिसर में किया गया था, जहाँ देशभर से आए साहित्यकारों, संपादकों और शोधकर्ताओं के बीच विचारों का गंभीर आदान–प्रदान हुआ, परंतु इस शैक्षणिक वातावरण के साथ–साथ जिस तत्व ने सबसे अधिक प्रभावित किया, वह था स्वयं इंदौर शहर का जीवंत और स्वच्छ व्यक्तित्व।

इंदौर को लेकर प्रायः कहा जाता है कि यह भारत का सबसे स्वच्छ शहर है, परंतु जब तक कोई स्वयं उस शहर की सड़कों पर चलकर, उसकी बस्तियों को देखकर और उसकी सुबह–शाम की लय को अनुभव करके न देखे, तब तक इस कथन का वास्तविक अर्थ समझ में नहीं आता। शहर में प्रवेश करते ही सबसे पहले जो बात ध्यान आकर्षित करती है, वह है सड़कों का आश्चर्यजनक रूप से साफ होना, कहीं भी कूड़े–कचरे के ढेर का न दिखना और ट्रैफिक के बावजूद वातावरण में एक तरह की व्यवस्थित शांति का अनुभव होना। यह स्वच्छता केवल मुख्य मार्गों या वीआईपी क्षेत्रों तक सीमित नहीं दिखी, बल्कि छोटे–छोटे मोहल्लों, गलियों और बाज़ारों में भी लगभग समान रूप से बनी हुई थी। यही वह बिंदु है जहाँ इंदौर अन्य भारतीय शहरों से स्वयं को अलग स्थापित करता है।

भारत सरकार के वार्षिक स्वच्छता सर्वेक्षण में इंदौर का लगातार शीर्ष स्थान पर बने रहना केवल किसी प्रशासनिक संयोग का परिणाम नहीं है, बल्कि यह लंबे समय से चल रहे एक सुनियोजित और सहभागी शहरी प्रबंधन का परिणाम है। नगर निगम द्वारा घर–घर कचरा संग्रहण की व्यवस्था, गीले और सूखे कचरे के पृथक्करण पर विशेष बल, तथा नागरिकों को इस प्रक्रिया में सक्रिय भागीदारी के लिए प्रेरित करना—ये सभी कदम मिलकर एक ऐसी सामूहिक चेतना का निर्माण करते हैं जिसमें स्वच्छता केवल सरकारी योजना न रहकर नागरिक संस्कार का रूप ले लेती है। शहर के 100 प्रतिशत वार्डों में डोर–टू–डोर कचरा संग्रहण प्रणाली लागू है, जिससे खुले में कचरा फेंकने की प्रवृत्ति लगभग समाप्त हो चुकी है।

सम्मेलन के दौरान जब भी विश्वविद्यालय परिसर से शहर के विभिन्न भागों में जाने का अवसर मिला, तब हर बार यह अनुभव हुआ कि इंदौर ने स्वच्छता को केवल अभियान की तरह नहीं, बल्कि जीवनशैली की तरह अपनाया है। सुबह के समय सड़कों पर सफाई कर्मियों की सक्रियता, समय पर आने वाले कचरा वाहन और लोगों द्वारा निर्धारित समय पर कचरा देना—ये सब दृश्य एक अनुशासित नागरिक समाज की झलक प्रस्तुत करते हैं। कई स्थानों पर यह भी देखा गया कि यदि कोई व्यक्ति सड़क पर कचरा फेंकने का प्रयास करता है, तो आसपास के लोग स्वयं उसे रोकते हैं या टोका–टाकी करते हैं। यह सामाजिक दबाव ही किसी भी शहर की वास्तविक स्वच्छता का आधार बनता है, क्योंकि केवल कानून और दंड के माध्यम से स्थायी परिवर्तन संभव नहीं होता।

इंदौर की स्वच्छता के साथ–साथ उसकी यातायात व्यवस्था भी उल्लेखनीय है। यद्यपि यह एक तेजी से बढ़ता हुआ महानगर है, फिर भी मुख्य मार्गों पर ट्रैफिक सिग्नलों का पालन अपेक्षाकृत बेहतर दिखाई देता है। सार्वजनिक परिवहन, विशेषकर बस सेवाओं और ऑटो–रिक्शा की उपलब्धता ने शहर के भीतर आवागमन को सुगम बनाया है। कई चौराहों पर स्मार्ट सिग्नल प्रणाली और कैमरों की उपस्थिति यह संकेत देती है कि शहर ने आधुनिक तकनीक को भी शहरी प्रबंधन में प्रभावी ढंग से शामिल किया है। इस प्रकार स्वच्छता और स्मार्ट प्रबंधन का संयोजन इंदौर को एक समकालीन भारतीय शहर के आदर्श मॉडल के रूप में प्रस्तुत करता है।

सम्मेलन के प्रतिभागियों के साथ हुई अनौपचारिक चर्चाओं में भी इंदौर की प्रशंसा बार–बार सुनाई दी। देश के विभिन्न राज्यों से आए साहित्यकारों ने स्वीकार किया कि उन्होंने भारत के अनेक बड़े शहर देखे हैं, परंतु इंदौर जैसा संतुलित और व्यवस्थित शहरी अनुभव बहुत कम स्थानों पर मिलता है। यह संतुलन केवल भौतिक स्वच्छता तक सीमित नहीं है, बल्कि यहाँ की सामाजिक सौहार्द, खान–पान की विविधता, सांस्कृतिक सक्रियता और व्यापारिक जीवंतता में भी स्पष्ट दिखाई देता है। सराफा बाज़ार की रात्रिकालीन चहल–पहल हो या छप्पन दुकान की सुव्यवस्थित खाद्य संस्कृति—हर स्थान पर स्वच्छता और व्यवस्था का वही अनुशासन देखने को मिला जो दिन के समय शहर की सड़कों पर दिखाई देता है।

देवी अहिल्याबाई विश्वविद्यालय का परिसर स्वयं इस शहर की शैक्षणिक गरिमा का प्रतीक है। विस्तृत हरित क्षेत्र, साफ–सुथरी इमारतें, सुव्यवस्थित सभागार और व्यवस्थित आयोजन—इन सबने सम्मेलन को गरिमा प्रदान की। विश्वविद्यालय में हाल के वर्षों में आयोजित दीक्षांत समारोहों और सांस्कृतिक आयोजनों में भी व्यापक भागीदारी देखी गई है, जिससे स्पष्ट होता है कि यह संस्थान केवल शैक्षणिक गतिविधियों तक सीमित न रहकर सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन का भी महत्वपूर्ण केंद्र है।

इंदौर की एक विशेषता यह भी है कि यहाँ स्वच्छता को केवल दिखावे के लिए नहीं, बल्कि संसाधन प्रबंधन के साथ जोड़ा गया है। शहर में उत्पन्न कचरे का वैज्ञानिक प्रसंस्करण, कंपोस्टिंग और पुनर्चक्रण की प्रक्रियाएँ न केवल पर्यावरण की दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं, बल्कि यह भी सुनिश्चित करती हैं कि शहर का कचरा स्वयं शहर पर बोझ न बने। निर्माण एवं विध्वंस अपशिष्ट के लिए पृथक प्रसंस्करण संयंत्र की स्थापना और उससे निर्मित उत्पादों का पुन: उपयोग इस बात का संकेत है कि इंदौर ने कचरे को समस्या नहीं, बल्कि संसाधन के रूप में देखने की दृष्टि विकसित की है।

हालाँकि यह भी स्वीकार करना होगा कि किसी भी शहर की तरह इंदौर भी पूर्णतः समस्यामुक्त नहीं है। जल आपूर्ति, जनसंख्या वृद्धि और शहरी विस्तार से जुड़ी चुनौतियाँ यहाँ भी मौजूद हैं, और समय–समय पर इनसे संबंधित घटनाएँ यह याद दिलाती हैं कि निरंतर सजगता और सुधार की आवश्यकता बनी रहती है। फिर भी, इन चुनौतियों के बावजूद जिस प्रकार शहर ने अपनी समग्र छवि और व्यवस्था को बनाए रखा है, वह उसकी प्रशासनिक तत्परता और नागरिक भागीदारी दोनों का संयुक्त परिणाम है।

इंदौर प्रवास के इन दो–तीन दिनों ने यह स्पष्ट कर दिया कि किसी शहर की पहचान केवल उसकी इमारतों, सड़कों या बाजारों से नहीं बनती, बल्कि वह वहाँ के लोगों के व्यवहार, उनकी आदतों और सामूहिक चेतना से निर्मित होती है। स्वच्छता केवल झाड़ू लगाने से नहीं आती; वह तब आती है जब लोग कूड़ा फेंकना ही छोड़ दें, जब दुकानदार अपनी दुकान के सामने सफाई को अपनी जिम्मेदारी समझे, जब छात्र–छात्राएँ विश्वविद्यालय परिसर को अपने घर जैसा समझकर उसकी देखभाल करें, और जब प्रशासन नागरिकों को दंड के भय से नहीं, बल्कि सहभागिता के भाव से जोड़ने में सफल हो।

इसीलिए जब यह कहा जाता है कि “यूं ही नहीं कोई शहर इंदौर हो जाता”, तो यह केवल एक भावनात्मक वाक्य नहीं, बल्कि एक गहरी सामाजिक सच्चाई है। इंदौर की सफलता यह बताती है कि यदि राजनीतिक इच्छाशक्ति, प्रशासनिक दक्षता और नागरिक अनुशासन तीनों एक साथ काम करें, तो भारतीय शहर भी विश्वस्तरीय स्वच्छता और व्यवस्था का उदाहरण बन सकते हैं। यह शहर केवल मध्य प्रदेश का नहीं, बल्कि पूरे देश का गौरव बन चुका है और अन्य नगरों के लिए एक जीवंत पाठशाला की तरह है, जहाँ से वे सीख सकते हैं कि स्वच्छता अभियान कैसे एक स्थायी शहरी संस्कृति में परिवर्तित किया जा सकता है।

इस यात्रा ने मुझे यह भी सोचने के लिए प्रेरित किया कि साहित्य और समाज का संबंध कितना गहरा है। जिस शहर में स्वच्छता, अनुशासन और सांस्कृतिक चेतना एक साथ फलती–फूलती है, वहाँ साहित्यिक संवाद भी अधिक सार्थक और जीवंत हो उठता है। इंदौर ने यह सिद्ध किया कि एक शहर केवल आर्थिक या औद्योगिक प्रगति से महान नहीं बनता, बल्कि वह तब महान बनता है जब उसकी सड़कें साफ हों, उसका वातावरण स्वस्थ हो और उसके नागरिक अपने शहर पर गर्व करते हुए उसके प्रति जिम्मेदारी का निर्वहन करें। यही कारण है कि इस शहर से लौटते समय मन में एक ही भाव बार–बार उभरता रहा—सचमुच, यूं ही नहीं कोई शहर इंदौर हो जाता।

— डॉ. शैलेश शुक्ला

डॉ. शैलेश शुक्ला

राजभाषा अधिकारी एनएमडीसी [भारत सरकार का एक उपक्रम] प्रशासनिक कार्यालय, डीआईओएम, दोणीमलै टाउनशिप जिला बेल्लारी - 583118 मो.-8759411563