अपनापन की आड़ में
मुस्कानों की ओट में, छुपा हुआ अवसाद।
हर रिश्ता अब बन गया, मतलब का संवाद॥
अपने ही जब दे गए, दिल पर गहरे घाव।
फिर किससे उम्मीद हो, रखें कहाँ हम चाव॥
चेहरों पर विश्वास है, दिल में बैठे खोट।
मीठी मीठी बात में, छुपी हुई है चोट॥
अपनों के इस खेल में, सबका अलग विधान।
बाहर से मुस्कान है, भीतर है तूफान॥
मीठे-मीठे बोल से, करते दिल पर वार।
अपनापन के नाम पर, चलता यूँ व्यापार॥
होंठों पर सौरभ हँसी, मन में काँटे शूल।
कैसा ये अपनत्व है, कैसे बनें उसूल॥
अपनापन की आड़ में, चलता गंदा खेल।
दिल के रिश्ते हारते, जीत गया यह मेल॥
— डॉ. प्रियंका सौरभ
