हास्य व्यंग्य

हास्य-व्यंग्य : विरह के कवि तथा नायिकाओं का संकट

आजकल की नायिकाओं को विरह-वेदना की अग्नि में नहीं जलना पड़ता है इसलिए वियोग के कवि की उत्पत्ति नहीं हो पा रही है। वियोग के कवियों का संकट होने का है क्योंकि जैसे ही वियोग रस आने की सूचना मिलती है। कोई न कोई सहारा बनकर उसके अंत:स्थल में प्रवेश कर जाता है।

यही मुख्य वजह है कि विरह रस की उत्पत्ति नहीं हो पा रही है। तब जमाना होता था कि नायिकायें कई दिन तक प्रेम विरह की आग में जलकर आत्मदाह करने को तैयार रहती थी। पिय की याद में तन-मन सब सूख कर कांटा हो जाता था।

तब का कवि ऐसी नायिकाओं की दीन हीन दशा देखकर विरह वेदना का ऐसा भाव अपनी काव्य चेतना में भर देता था। पढ़ने वाला रुदन के गहरे सदमे में चला जाता था।

वहां पर सच्चे प्रेम की भूख प्यास लगी रहती थी। दूसरे की तरफ भी मुंह उठकर नहीं देखती थी। तब के प्रेम में पवित्रता का भाव होता था। साफ सुथरा प्रेम का संगम होता था। एक ही नायक की याद में नायिकायें जीवन गुजार देती थी।

विरह में लिखी रचनायें भी अमरत्व को प्राप्त कर लेती थी।
आज का जो परिवेश बना है कि विरह की तड़प क्या चीज होता है? उससे नायिका अनभिज्ञ है। प्रेम के सारे तालाब प्रेम के पानी से भरे हैं। नायिका किसी भी तालाब में डुबकी लगा सकती है।

आधुनिक युग में विरह की तड़प में कोई नायिका और कवि जलना ही नहीं जानता। आजकल की बढ़ती श्रृंगार रस की रचनाओं का मुख्य वजह यही है। विरह का कवि तथा विरह की नायिका आधुनिक युग में मिलना मुश्किल है।

— जयचन्द प्रजापति ‘जय’

*जयचन्द प्रजापति

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