कविता – बेरोज़गारी और नवोदित समाज
नव सुबह का स्वप्न लिए,
चल पड़ा युवा अरमान लिए,
हाथों में डिग्री चमक रही,
मन में उम्मीदों की पहचान लिए।
पर राहों में अंधियारा है,
हर मोड़ पे इक प्रश्न खड़ा,
कहाँ मिले वो कर्मभूमि,
जहाँ खिले उसका भाग्य बड़ा?
शिक्षा का दीप जलाया था,
माता-पिता ने आशा से,
पर बेरोज़गारी की आँधी ने,
बुझा दिया सब भाषा से।
भीड़ बढ़ी है डिग्रियों की,
पर अवसर हैं सीमित यहाँ,
कौशल का मूल्य न समझे,
भटक रहा है युवा जहाँ।
नवोदित समाज पुकारे,
“दे दो हमको सही दिशा”,
हम ही तो भविष्य तुम्हारा,
हमसे ही है देश की आशा।
उठो, बदलो ये हालात,
नई सोच का दीप जलाओ,
स्वरोज़गार की राह पकड़ो,
अपना भाग्य स्वयं बनाओ।
जब श्रम का सम्मान होगा,
हर हाथ को काम मिलेगा,
तब नव भारत का हर कोना,
सच्चे विकास से खिल उठेगा।
— डॉ. आकांक्षा रुपा चचरा
