सामाजिक

अलमारी में सजी हुई किताबें घर के बौद्धिक स्तर और संस्कारों को दर्शाती हैं

आज हम उस युग में जी रहे हैं जिसे ‘डिजिटल क्रांति’ का नाम दिया गया है। सूचना का विस्फोट कुछ ऐसा है कि दुनिया की किसी भी जानकारी को प्राप्त करने के लिए अब पुस्तकालयों के चक्कर लगाने की जरूरत नहीं, बस एक ‘क्लिक’ ही काफ़ी है। मोबाइल ऐप्स, किंडल और ऑनलाइन ने हमारे पढ़ने के नज़रिए को पूरी तरह बदल दिया है। लेकिन इस तकनीकी चकाचौंध के बीच एक गंभीर विमर्श जन्म लेता है,क्या कागज़ पर छपे शब्द अपनी चमक खो रहे हैं?
छपी हुई किताबों का मनोवैज्ञानिक और इंद्रिय अनुभव
किताब केवल कागज़ों का पुलिंदा नहीं होती, वह एक जीवंत अनुभव है। ई-बुक्स हमें जानकारी तो दे सकती हैं, लेकिन वह ‘अहसास’ नहीं दे सकतीं जो एक भौतिक पुस्तक देती है। नई किताब के पन्नों की महक और उसे हाथों में थामने का सुकून पाठक को एक अलग ही दुनिया में ले जाता है।
डिजिटल स्क्रीन पर पढ़ते समय नोटिफिकेशन, ईमेल और विज्ञापनों का शोर होता है, जो हमारी एकाग्रता को भंग करता है। इसके विपरीत, एक भौतिक किताब हमें गहन अध्ययन की ओर ले जाती है, जिससे सोचने की क्षमता विकसित होती है।
डिजिटल युग हमें ‘तुरंत परिणाम का आदी बना रहा है, जबकि किताब का हर पलटता पन्ना हमें धैर्य और गहराई से विषय को समझने का संस्कार देता है।
किताबें हमारी सांस्कृतिक विरासत की संवाहक हैं। एक अलमारी में सजी हुई किताबें उस घर के बौद्धिक स्तर और संस्कारों को दर्शाती हैं।
बुज़ुर्गों द्वारा दी गई किताबें, उन पर लिखे उनके नाम या उनके द्वारा रेखांकित की गई पंक्तियाँ सिर्फ ज्ञान नहीं, बल्कि एक भावनात्मक विरासत होती हैं। डिजिट्ल फ़ाइलों में यह आत्मीयता और ‘स्मृति मूल्य’ नहीं मिल पाता।
लंबे समय तक स्क्रीन पर पढ़ने से ‘डिजिटल आई स्ट्रेन’ जैसी समस्याएं होती हैं, जबकि कागज़ी किताबें स्वास्थ्य के लिहाज़ से अधिक सुरक्षित हैं।
तकनीक को नकारा नहीं जा सकता।
एक छोटा सा टैबलेट हजारों किताबों का भार संभाल सकता है। शोधकर्ताओं और छात्रों के लिए, जो सफ़र में रहते हैं, यह एक वरदान है।
दुर्लभ पुस्तकें जो किसी शहर की लाइब्रेरी में उपलब्ध नहीं हैं, वे इंटरनेट के जरिए दुनिया के किसी भी कोने में पढ़ी जा सकती हैं।
ई-बुक्स के बढ़ते चलन से कागज़ की खपत कम होती है, जो पेड़ों के संरक्षण में सहायक है।
डिजिट्ल फॉर्मेंट और छपी हुई किताबें एक-दूसरे की प्रतिस्पर्धी नहीं, बल्कि पूरक हैं। जहाँ त्वरित जानकारी और शोध के लिए डिजिट्ल माध्यम अनिवार्य है, वहीं वैचारिक स्पष्टता, मानसिक शांति और संवेगात्मक जुड़ाव के लिए छपी हुई किताबों का कोई विकल्प नहीं है।
“माध्यम चाहे कागज़ हो या पिक्सेल, महत्वपूर्ण यह है कि शब्द जीवित रहें और पढ़ने की संस्कृति बची रहे।”
आज की पीढ़ी को चाहिए कि वे तकनीक का लाभ उठाएं, लेकिन अपनी अलमारी में उन किताबों को भी जगह दें जो उन्हें उनके इतिहास, समाज और स्वयं की गहराई से जोड़ती हैं।

— डॉ. मुश्ताक अहमद शाह ‘सहज’

डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह

पिता का नाम: अशफ़ाक़ अहमद शाह जन्मतिथि: 24 जून जन्मस्थान: ग्राम बलड़ी, तहसील हरसूद, जिला खंडवा, मध्य प्रदेश कर्मभूमि: हरदा, मध्य प्रदेश स्थायी पता: मगरधा, जिला हरदा, पिन 461335 संपर्क: मोबाइल: 9993901625 ईमेल: dr.m.a.shaholo2@gmail.com शैक्षिक योग्यता एवं व्यवसाय शिक्षा,B.N.Y.S.बैचलर ऑफ़ नेचुरोपैथी एंड योगिक साइंस. बी.कॉम, एम.कॉम बी.एड. फार्मासिस्ट आयुर्वेद रत्न, सी.सी.एच. व्यवसाय: फार्मासिस्ट, भाषाई दक्षता एवं रुचियाँ भाषाएँ, हिंदी, उर्दू, अंग्रेज़ी रुचियाँ, गीत, ग़ज़ल एवं सामयिक लेखन अध्ययन एवं ज्ञानार्जन साहित्यिक परिवेश में रहना वालिद (पिता) से प्रेरित होकर ग़ज़ल लेखन पूर्व पद एवं सामाजिक योगदान, पूर्व प्राचार्य, ज्ञानदीप हाई स्कूल, मगरधा पूर्व प्रधान पाठक, उर्दू माध्यमिक शाला, बलड़ी ग्रामीण विकास विस्तार अधिकारी, बलड़ी कम्युनिटी हेल्थ वर्कर, मगरधा साहित्यिक यात्रा लेखन का अनुभव: 30 वर्षों से निरंतर लेखन प्रकाशित रचनाएँ: 2000+ कविताएँ, ग़ज़लें, सामयिक लेख प्रकाशन, निरन्तर, द ग्राम टू डे, दी वूमंस एक्सप्रेस, एजुकेशनल समाचार पत्र (पटना), संस्कार धनी (जबलपुर),जबलपुर दर्पण, सुबह प्रकाश , दैनिक दोपहर,संस्कार न्यूज,नई रोशनी समाचार पत्र,परिवहन विशेष,समाचार पत्र, घटती घटना समाचार पत्र,कोल फील्ड मिरर (पश्चिम बंगाल), अनोख तीर (हरदा), दक्सिन समाचार पत्र, नगसर संवाद, नगर कथा साप्ताहिक (इटारसी) दैनिक भास्कर, नवदुनिया, चौथा संसार, दैनिक जागरण, मंथन (बुरहानपुर), कोरकू देशम (टिमरनी) में स्थायी कॉलम अन्य कई पत्र-पत्रिकाओं में निरंतर रचनाएँ प्रकाशित प्रकाशित पुस्तकें एवं साझा संग्रह साझा संग्रह (प्रमुख), मधुमालती, कोविड, काव्य ज्योति, जहाँ न पहुँचे रवि, दोहा ज्योति, गुलसितां, 21वीं सदी के 11 कवि, काव्य दर्पण, जहाँ न पहुँचे कवि (रवीना प्रकाशन) उर्विल, स्वर्णाभ, अमल तास, गुलमोहर, मेरी क़लम से, मेरी अनुभूति, मेरी अभिव्यक्ति, बेटियां, कोहिनूर, कविता बोलती है, हिंदी हैं हम, क़लम का कमाल, शब्द मेरे, तिरंगा ऊंचा रहे हमारा (मधुशाला प्रकाशन) अल्फ़ाज़ शब्दों का पिटारा, तहरीरें कुछ सुलझी कुछ न अनसुलझी (जील इन फिक्स पब्लिकेशन) व्यक्तिगत ग़ज़ल संग्रह: तुम भुलाये क्यों नहीं जाते तेरी नाराज़गी और मेरी ग़ज़लें तेरा इंतज़ार आज भी है (नवीनतम) पाँच नए ग़ज़ल संग्रह प्रकाशनाधीन सम्मान एवं पुरस्कार साहित्यिक योगदान के लिए अनेक सम्मान एवं पुरस्कार प्राप्त पाठकों का स्नेह, साहित्यिक मंचों से मान्यता मुश्ताक़ अहमद शाह जी का साहित्यिक और सामाजिक योगदान न केवल मध्य प्रदेश, बल्कि पूरे हिंदी-उर्दू साहित्य जगत के लिए गर्व का विषय है। आपकी लेखनी ने समाज को संवेदनशीलता, प्रेम और मानवीय मूल्यों से जोड़ा है। आपके द्वारा रचित ग़ज़लें और कविताएँ आज भी पाठकों के मन को छूती हैं और साहित्य को नई दिशा देती हैं।