कविता

कब उबरेंगे इस जंजाल से?

हाँ, मान लिया—
कहा जाता है कि अब समाप्त हो चुका जातिवाद,
पर जब कोई फरियादी
इंसाफ़ की आस लिए
दरवाज़ा खटखटाता है,
तब उसी दहलीज़ के भीतर
सोया हुआ जातिवाद
अचानक जाग जाता है—
और अंततः
पीड़ित ही
सबसे बड़ा अपराधी ठहरा दिया जाता है।

इधर आवाज़ें उठती हैं—
“कहाँ है जातिवाद?”
“यह तो सौहार्द्र तोड़ने का प्रयास है!”
कैसी विडंबना है—
दिखाने का यह भी एक तरीका खास है,

जहाँ सत्य को ही
कटघरे में खड़ा कर दिया जाता है।
पीड़ित, थककर,
इसे अपनी नियति मान लेता है,

क्योंकि इस तंत्र के प्रहरीयों से
लड़ना आसान नहीं—
यह कोई मंचों पर बिखरता
भाषणों का ज्ञान नहीं।

उधर,
तंत्र के भीतर बैठा जातिवाद
मंद-मंद मुस्कुरा रहा है,
और सदियों से शोषित मनुष्य
बार-बार
उसी जाल में उलझ रहा है।

संवैधानिक प्रावधान—
जिन्हें होना था ढाल,
उन्हें ही
तोड़ा-मरोड़ा जा रहा है,
ऊपर से नीचे तक
बैठे हुए तथाकथित “महामानव”
हर श्वास में
इस विष को घोल रहे हैं।

पता नहीं—
कब तक यह तिलस्म
यूँ ही छाया रहेगा,
और कब
यह देश
इस जंजाल से
वास्तव में मुक्त हो पाएगा।

— राजेन्द्र लाहिरी

राजेन्द्र लाहिरी

पामगढ़, जिला जांजगीर चाम्पा, छ. ग.495554