राजनीति

चुनाव आयोग बनाम डिजिटल प्रचार : क्या नियम अप्रासंगिक हो चुके हैं?

भारतीय चुनाव आयोग की स्थापना 1950 में हुई थी — उस समय जब चुनाव प्रचार का अर्थ था दीवारों पर पोस्टर, नुक्कड़ सभाएँ, और अखबारों में विज्ञापन। उस युग के लिए जो नियम बनाए गए थे, वे अपने समय की दृष्टि से अत्यंत उचित और प्रभावी थे। लेकिन आज, जब चुनाव प्रचार का केंद्र फेसबुक की वॉल, व्हाट्सएप के समूह, यूट्यूब के चैनल और इंस्टाग्राम की रील्स बन चुकी हैं, तो यह प्रश्न बिल्कुल उचित और अत्यावश्यक है कि क्या चुनाव आयोग के पास इस नई डिजिटल वास्तविकता से निपटने के लिए पर्याप्त अधिकार, संसाधन और नियम हैं? उत्तर, दुर्भाग्य से, काफी हद तक नकारात्मक है।

जन प्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 और आदर्श आचार संहिता (एमसीसी) भारत में चुनाव प्रचार के मुख्य नियामक उपकरण हैं। आदर्श आचार संहिता में चुनाव प्रचार सामग्री के संबंध में कई प्रावधान हैं — जैसे कि धर्म, जाति या भाषा के आधार पर मतों की अपील न करना, मतदाताओं को रिश्वत न देना, और चुनाव खर्च की सीमा का पालन करना। लेकिन ये प्रावधान मुख्यतः भौतिक दुनिया — रैलियों, पोस्टरों, होर्डिंगों, और प्रसारण मीडिया — को ध्यान में रखकर बनाए गए थे। डिजिटल प्रचार के कई रूप इन नियमों के स्पष्ट दायरे से बाहर हैं।

चुनाव खर्च की सीमा का उदाहरण लें। 2024 के लोकसभा चुनाव में लोकसभा उम्मीदवारों के लिए खर्च की अधिकतम सीमा 95 लाख रुपये (बड़े राज्यों में) और 75 लाख रुपये (छोटे राज्यों में) निर्धारित थी। लेकिन डिजिटल विज्ञापनों का एक बड़ा हिस्सा उम्मीदवारों के नाम पर नहीं, बल्कि पार्टी के नाम पर, तीसरे पक्ष के संगठनों के नाम पर, या बिल्कुल अनाम रूप से चलाया जाता है। व्हाट्सएप समूहों के माध्यम से किए जाने वाले प्रचार का कोई मौद्रिक मूल्यांकन संभव नहीं है, और इसे खर्च की सीमा में शामिल नहीं किया जाता। इस प्रकार, डिजिटल माध्यम चुनाव खर्च की सीमा को अप्रासंगिक बना देता है।

2019 के आम चुनाव में एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) की एक रिपोर्ट के अनुसार, राजनीतिक दलों द्वारा फेसबुक और गूगल पर घोषित डिजिटल विज्ञापन खर्च का जो आँकड़ा चुनाव आयोग को दिया गया, वह वास्तविक खर्च से काफी कम था। फेसबुक की स्वयं की ‘एड लाइब्रेरी’ रिपोर्ट से पता चला कि केवल भाजपा और कांग्रेस ने उस चुनाव के दौरान फेसबुक पर करोड़ों रुपये के विज्ञापन दिए थे, लेकिन इसका एक बड़ा हिस्सा चुनाव आयोग को दी गई खर्च विवरणी में शामिल नहीं था। यह नियामक प्रणाली की एक मौलिक खामी को उजागर करता है।

पेड न्यूज़ की समस्या, जो पहले मुख्यतः प्रिंट और टेलीविज़न मीडिया में थी, अब डिजिटल माध्यमों में और भी विकराल रूप ले चुकी है। डिजिटल न्यूज़ पोर्टलों, यूट्यूब चैनलों और सोशल मीडिया ‘इन्फ्लुएंसरों’ को राजनीतिक प्रचार के लिए पैसे देना और उसे ‘समाचार’ या ‘विचार’ के रूप में प्रस्तुत करना बेहद आसान हो गया है। चुनाव आयोग के पेड न्यूज़ से संबंधित प्रावधान मुख्यतः पंजीकृत प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पर लागू होते हैं। हज़ारों अनाम या कम-ज्ञात डिजिटल प्रकाशनों और सोशल मीडिया खातों पर इन्हें प्रभावी ढंग से लागू करना लगभग असंभव है।

साइलेंस पीरियड — यानी मतदान से 48 घंटे पहले का वह समय जब राजनीतिक प्रचार बंद होना चाहिए — डिजिटल युग में भी एक बड़ी चुनौती है। टेलीविज़न और रेडियो पर इसे लागू करना अपेक्षाकृत सरल है, लेकिन सोशल मीडिया पर यह नियम व्यावहारिक रूप से कागज़ी बन जाता है। पुराने पोस्ट और वीडियो सर्कुलेट होते रहते हैं, नए ‘स्पॉन्सर्ड’ कंटेंट अप्रत्यक्ष रूप से जारी रहते हैं, और व्हाट्सएप समूहों में तो किसी प्रकार की कोई रोक संभव ही नहीं है। 2019 और 2024 दोनों चुनावों में इस नियम के उल्लंघन की अनेक शिकायतें आईं, लेकिन कार्रवाई नगण्य रही।

चुनाव आयोग ने इस बदलती परिस्थिति के प्रति पूरी तरह आँखें नहीं मूँदी हैं। 2019 के चुनाव के पहले आयोग ने सोशल मीडिया कंपनियों के साथ एक ‘स्वैच्छिक आचार संहिता’ पर हस्ताक्षर किए और एक ‘सोशल मीडिया कमेटी’ का गठन किया। 2024 के चुनाव के लिए मेटा, गूगल, और अन्य कंपनियों के साथ समझौते किए गए। लेकिन ये समझौते मुख्यतः स्वैच्छिक हैं, इनमें कानूनी बाध्यता नहीं है, और इनका क्रियान्वयन असंगत रहा है। जब कोई कंपनी चुनाव आयोग के अनुरोध पर कोई सामग्री हटाने से इनकार करती है, तो आयोग के पास सीमित विकल्प होते हैं।

तुलनात्मक दृष्टि से देखें तो कई लोकतांत्रिक देशों में डिजिटल प्रचार के नियमन के लिए अधिक व्यापक प्रयास हुए हैं। यूरोपीय संघ ने ‘पॉलिटिकल एडवर्टाइज़िंग ट्रांसपेरेंसी रेगुलेशन’ पारित किया है जो राजनीतिक विज्ञापनों में अनिवार्य प्रकटीकरण (डिसक्लोज़र) की माँग करता है। कनाडा ने ‘इलेक्शन्स मॉडर्नाइज़ेशन एक्ट’ में ऑनलाइन राजनीतिक विज्ञापनों के लिए पंजीकरण और पारदर्शिता की अनिवार्य आवश्यकताएँ जोड़ी हैं। ऑस्ट्रेलिया में डिजिटल प्रचार सामग्री पर भी ‘प्रायोजित’ लेबल अनिवार्य है। भारत में ऐसे व्यापक और बाध्यकारी कानूनी प्रावधान अभी भी नहीं हैं।

डिजिटल राजनीतिक विज्ञापनों की पारदर्शिता का मामला अत्यंत महत्वपूर्ण है। फेसबुक की ‘एड लाइब्रेरी’ और गूगल की ‘ट्रांसपेरेंसी रिपोर्ट’ कुछ जानकारी देती हैं, लेकिन यह पूरी तस्वीर नहीं है। व्हाट्सएप, टेलीग्राम और अन्य एन्क्रिप्टेड मैसेजिंग सेवाओं पर होने वाला राजनीतिक प्रचार बिल्कुल अपारदर्शी है। एक अनुमान के अनुसार, भारत में 2024 के चुनाव के दौरान व्हाट्सएप पर प्रतिदिन करोड़ों राजनीतिक संदेश प्रसारित होते थे, लेकिन उनमें से कितने भुगतान किए गए थे और किसने भुगतान किया था — यह जानने का कोई तरीका नहीं था।

माइक्रोटार्गेटेड राजनीतिक विज्ञापन चुनाव आयोग के लिए एक और अनसुलझी चुनौती है। जब कोई राजनीतिक दल फेसबुक पर एक विशेष जाति या धार्मिक समूह को लक्षित करके ऐसे विज्ञापन दिखाता है जो सार्वजनिक नहीं हैं, तो चुनाव आयोग इसकी जाँच कैसे करे? आदर्श आचार संहिता का वह प्रावधान जो जातीय या धार्मिक आधार पर वोट माँगने को मना करता है, उन विज्ञापनों पर कैसे लागू हो जो केवल एक विशेष समुदाय तक पहुँचते हैं और जिनका कोई सार्वजनिक रिकॉर्ड नहीं है? यह एक ऐसी विधिक और तकनीकी पहेली है जिसका समाधान भारत के पास अभी नहीं है।

कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि चुनाव आयोग को अधिक तकनीकी क्षमता और मानव संसाधन की आवश्यकता है। एक विशेष ‘डिजिटल मॉनिटरिंग सेल’ जिसमें डेटा वैज्ञानिक, सोशल मीडिया विशेषज्ञ और साइबर सुरक्षा पेशेवर हों — यह आज की ज़रूरत है। साथ ही, प्रत्येक राज्य और ज़िला स्तर पर डिजिटल प्रचार की निगरानी की क्षमता विकसित करनी होगी। लेकिन यह भी स्वीकार करना होगा कि तकनीकी निगरानी की अपनी सीमाएँ हैं — जब प्रचार का पैमाना अरबों संदेशों और करोड़ों उपयोगकर्ताओं तक फैला हो, तो किसी भी नियामक संस्था के लिए पूर्ण नियंत्रण असंभव है।

कानूनी सुधार की भी तत्काल आवश्यकता है। जन प्रतिनिधित्व अधिनियम में डिजिटल प्रचार को स्पष्ट रूप से परिभाषित करना, ऑनलाइन राजनीतिक विज्ञापनों के लिए अनिवार्य प्रकटीकरण नियम बनाना, चुनाव खर्च की परिभाषा में डिजिटल खर्च को शामिल करना, और डिजिटल मंचों के लिए चुनाव से संबंधित विशेष जवाबदेही तय करना — ये सब आवश्यक कदम हैं। विधि आयोग और संसदीय समितियों ने इस दिशा में कुछ सिफारिशें की हैं, लेकिन उनके क्रियान्वयन में राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी रही है।

अंततः, यह प्रश्न केवल तकनीकी या कानूनी नहीं है — यह लोकतांत्रिक प्रक्रिया की गुणवत्ता का प्रश्न है। चुनाव आयोग का उद्देश्य स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करना है। जब डिजिटल प्रचार के माध्यम से असीमित और अनियंत्रित धन, फर्जी जानकारी, और मनोवैज्ञानिक हेरफेर चुनावी प्रक्रिया में प्रवेश कर जाते हैं, तो ‘स्वतंत्र और निष्पक्ष’ का अर्थ ही संदिग्ध हो जाता है। इस चुनौती से निपटने में देरी का मतलब है — भारत की लोकतांत्रिक प्रक्रिया को उन शक्तियों के सामने कमज़ोर छोड़ना जो इसे अपने हित में मोड़ने की क्षमता और इच्छा रखती हैं।

— डॉ. शैलेश शुक्ला

डॉ. शैलेश शुक्ला

राजभाषा अधिकारी एनएमडीसी [भारत सरकार का एक उपक्रम] प्रशासनिक कार्यालय, डीआईओएम, दोणीमलै टाउनशिप जिला बेल्लारी - 583118 मो.-8759411563