कविता

मैं वही नारी हूँ

मैं वही नारी हूँ—
चूल्हे की आँच में तपकर निखरी,
बर्तनों की खनक में खोई थी,
पर मन में रोशनी ही बिखरी।

आँगन तक सीमित थी दुनिया,
फिर भी सपनों का विस्तार था,
थकी हुई हर साँझ के पीछे
एक नया ही उद्गार था।

झाड़ू की हर रेखा में
मैंने जीवन लिख डाला,
आँसू पीकर भी मुस्काई,
दर्द को हँसकर टाला।

जब सबने सीमाएँ बाँधीं,
मैंने साहस से तोड़ीं,
अक्षर-अक्षर जोड़कर मैंने
अपनी राहें खुद जोड़ीं।

आज खड़ी हूँ उस शिखर पर,
जहाँ पहुँचना कठिन कहा था,
मैंने श्रम को शक्ति बनाया,
और खुद को खुद ही गढ़ा था।

— डॉ. प्रियंका सौरभ

*डॉ. प्रियंका सौरभ

रिसर्च स्कॉलर इन पोलिटिकल साइंस, कवयित्री, स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार, (मो.) 7015375570 (वार्ता+वाट्स एप) facebook - https://www.facebook.com/PriyankaSaurabh20/ twitter- https://twitter.com/pari_saurabh