कविता

जीवन के रंग

मुझे देखना था—
आग कहीं एक ही ओर तो नहीं,
या फिर दूसरी दिशा भी
उतनी ही तपिश से दहक रही है;
क्योंकि आग का न्याय यही है—
दोनों ओर समान रूप से जलना।

एक टकटकी बाँधे
नींद से जूझता मन,
चाहता था कि
थोड़ी-सी चेतना उधर भी जागे—
सिर्फ यहाँ नहीं।

वैसे भी यह अग्नि
क्षणिक नहीं,
बरसों की जमी परंपरा है।
सुबह जब देखा,
वह मुरझाई-सी बैठी थी,
मानो दृश्य से ही आहत होकर
उस स्थान को छोड़ देने की जिद में हो।

पर कुछ ही क्षणों बाद—
वही चेहरा खिलखिला उठा,
किसी की उपस्थिति में
लाज से भीगता हुआ।

समझ न सका—
यह व्यवहार था,
कोई गूढ़ रणनीति,
या फिर मासूम बचपना
जो सदाचार का आवरण ओढ़े था।

खैर,
जिंदगी अपने रूप
अचानक ही दिखा देती है—
और वह क्या ही मनुष्य है
जो इन सभी रंगों को
अपने भीतर नहीं समेट पाता।

— राजेन्द्र लाहिरी

राजेन्द्र लाहिरी

पामगढ़, जिला जांजगीर चाम्पा, छ. ग.495554