गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल

पेड़ पीली पत्तियों से भर गया
क्या समझकर फूस का घर डर गया

हर किसी ने किस तरह देखा मुझे
छोड़ वो देखूँ कि अब मैं मर गया

जब महाराक्षस अभी है मत कहो
मर गया तोता कि संकट टर गया

चाहिए था और रुक जाना मुझे
आज सोना हाट सस्ता कर गया

एक सन्नाटा मिला घर बंद था
भेंट करने जब सखा के दर गया

देखकर ही राह चलनी चाहिए
सुन रहा हूँ क्योंकि खा ठोकर गया

ढूँढ़ लाओ और दो भारी सज़ा
तोड़कर शीशा कहाँ पत्थर गया

— केशव शरण

केशव शरण

वाराणसी 9415295137