कविता

धारे के राही

बहे जा रहे हैं धारा के संग,
अपनी ही मस्ती, अपने ही रंग।
भूल गए हैं यह सरल-सी बात—
इन राहों में हैं अनेकों आघात,
कहीं विरल, कहीं घने अवरोध,
कहीं मौन, कहीं मुखर विरोध।

दुनिया को देना होगा जवाब,
छोड़कर अधरों तक आए निवाले का हिसाब।
बिना सोचे कि कब उतर आए
जीवन में कोई गहरी घाटी,
और बेहोशी के उस आलम में
पूछे जाएँगे—
तुम्हारी जाति, तुम्हारा धर्म, तुम्हारी थाती।

सोचना होगा—
धारा के संग बहती हैं
अक्सर मृत मछलियाँ,
और जीवित होने का प्रमाण है—
धारा के विपरीत तैरती इच्छाएँ।

याद रखना होगा—
असमय खुलते हैं अनेक मुख,
आलोचना, लोक-लाज, निंदा के स्वर,
जो कसौटी बनकर कसते हैं अंतर।

निश्चिंत वही रह सकता है,
जिसकी मंज़िल स्वार्थ से परे हो,
जो सोचता हो—
सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय—
यही तो लक्ष्य है
हर मननशील हृदय का,
हर जाग्रत व्यक्ति का।

— राजेन्द्र लाहिरी

राजेन्द्र लाहिरी

पामगढ़, जिला जांजगीर चाम्पा, छ. ग.495554