हलकान
निराशा के गहन अंधेरो में डूबता जा रहा हूं
जीवन के इस पड़ाव पर शून्य होता जा रहा हूं !
कोई तृष्णा, कोई लालसा ,न कोई सपने
इस मन में अब कोई आस नही जगा पा रहा हूं !
सालो की सख्त आजमाइशो ने इस कदर तोड़ा
अपनी पलको से टूटे —- खुशियों के किरचे बटोर रहा हूं !
क्या फर्क पड़ता मेरे होने से इस दुनिया को
यूं ही अपनो के लिए पलपल मिटे जा रहा हूं !
बस जिंदगी में थोड़ा -सा सुकून ही तो चाहिए था
इतनी -सी चाह के लिए हलकान हुए जा रहा हूं !
— विभा कुमारी “नीरजा”
