पूनम की रात
चुपचाप बैठा
पूनम की रात में
छत पर अकेला
चांद को निहार रहा था मैं…
चारों तरफ शांति ही शांति
श्वेत चादर फैली थी आकाश में
मदमस्त चांद
और ठंडी मलय समीर
घायल कर रही थी
मेरा हृदय !
विचार रूपी नौका
मन रूपी सागर में तैर रही थी
भावुकता के तट से टकराकर
हृदय में एक अजीब सी सिहरन दौड़ रही थी ।
मैं स्वयं से मुक्त महसूस कर रहा था
एक असीम शांति मिली
जब फिजूल के विचार मिटे
मैं तन्हाई में भी सुकून का एहसास कर रहा था
चुपचाप बैठा…
— मुकेश कुमार ऋषि वर्मा
