दोहांकुर
गिरगिट बोला सांप से, थामो मेरा हाथ।
सदा करेंगे राज हम, अगर रहेंगे साथ।।
कोई जूठन चाटता, कोई छप्पन भोग।
निज कर्मों के लेख ही, भोग रहे सब लोग।।
सीख लिया संसार में, जिसने रहना मस्त।
उसको कर पातीं नहीं, विपदाएं भी त्रस्त।।
जीवटता से ही मिले, जग में नव उत्कर्ष।
सदा फूटतीं कोंपलें, करके ही संघर्ष।।
चूनर सरकी लाज की, टूट गए तटबंध।
मन अनुरागी हो गया, बिखरी प्रेम सुगंध।।
मित्र अगर हो लालची, उससे रखें न मेल।
खा जाती है वृक्ष को, उससे लिपती बेल।।
प्रेमी चाहे प्रेमिका, अंधा चाहे नैन।
चातक स्वाती बूंद को, तरस रहा दिन-रैन।।
सदा दमकती रूपसी, जैसे सोलर प्लेट।
लापरवाही यदि हुई, कर लेगी आखेट।।
एसी – सा ठंडा बदन, मीठी बोल रिमोट।
हैंडल बिद केयर करो, लगे न उसको चोट।।
तन खजुराहो सर्वदा, मन मानस के छंद।
गोदी में प्रतिरूप हो, अवध असल आनंद।।
— डॉ. अवधेश कुमार अवध
