लोग भूल जाते हैं एहसान
लोग भूल जाते हैं एहसान,
जब खड़ा हो जाता है मकान।
जिनके दर पे झुके थे हम कभी,
आज वही लगते हैं अनजान।
उन्हीं छतों से हमें ललकारते,
जिनसे लाया था कभी सामान।
वक्त बदला तो बदले हैं सभी,
खो गई है रिश्तों की पहचान।
कल सहारा जो बने थे राह में,
उन्हीं का करते दिखे अपमान।
ईंट-पत्थर की हुई ऊँचाइयाँ,
दब गया कहीं इंसान का मान।
दिल के रिश्ते हो गए बेजान,
अब कहाँ बाकी कोई अरमान।
याद रख ऐ दिल ज़रा ये बात भी,
नेकी ही है बस सच्चा सम्मान।
— डॉ. प्रियंका सौरभ
