ग़ज़ल
तू जो मुझसे मिली नहीं होती।
अपनों से दुश्मनी नहीं होती।।
ढूंढ लेता कोई सनम दूजा।
तुझसे जो दिल्लगी नहीं होती।।
मुस्कुरा कर गुजरते दिन औ रात।
मुझको तेरी कमीं नहीं होती।।
मैं तो महफ़िल सजा लेता अपनी।
बज़्म से वो उठी नहीं होती।।
फिर तो जुगनू चमक उठे होते।
आँख मेरी भरी नहीं होती।।
ये ग़ज़ल लिखते वक्त मैंने जो।
बात उसकी सुनी नहीं होती।।
अश्क आंखों में आते प्रीती क्यों।
आँख में यूं नमी नहीं होती।।
— प्रीती श्रीवास्तव
