कहानी

बीते लम्हे और आज का एहसास

​हवेली के उस पुराने मेहराबदार दालान में वक्त जैसे थम सा गया था। बाहर पेड़ों की घनी छांव से छनकर आती सुनहरी धूप ज़मीन पर यादों के नक्श बना रही थी। मेज़ पर रखी चाय की प्याली से उठता धुआं अतीत की धुंधली गलियों की तरह हवा में लहरें ले रहा था।  साहब ख़ामोशी से सामने बैठी अपनी शरीक़-ए-हयात को देख रहे थे, लेकिन उनकी नज़रें बार-बार मेज़ पर रखी उस छोटी सी तस्वीर की ओर भटक जातीं,जो उनके युवा दिनों की थी।

​ साहब, जिनकी शख्स़ियत में हिकमत (बुद्धिमत्ता) और अदब (साहित्य) का एक गहरा संगम था, आज कुछ ज़्यादा ही सोच में डूबे थे। वह जानते थे कि वक्त के पास सब कुछ छीन लेने का हुनर है, लेकिन एक संवेदनशील इंसान के पास वह कला है कि वह गुज़रते हुए लम्हे को यादों की ज़ंजीर पहना कर हमेशा के लिए क़ैद कर ले।

​उन्होंने अपनी पत्नी की आँखों में झांकते हुए बहुत धीमे से कहा, “कितनी अजीब बात है ना? यह तस्वीर में दिखने वाला नौजवान… इसने बहुत से तूफ़ान देखे, कई कड़वे घूँट पिए, लेकिन इसने कभी हार नहीं मानी। जानते हो क्यों? क्योंकि इसके पास यादों का एक सरमाया (पूंजी) था और उम्मीद का एक क़लम।”

​उनकी पत्नी ने मुस्कुरा कर उनकी तरफ़ देखा। वह जानती थीं कि साहब इस वक्त केवल शब्दों की दुनिया में नहीं, बल्कि यादों के उस शहर में हैं जहाँ बीता हुआ कल आज भी सांस ले रहा है। उन्होंने  साहब का हाथ थामते हुए कहा, “यह यादें ही तो हमें बताती हैं कि हमने कितना ख़ूबसूरत सफ़र तय किया है। ख़ूबसूरती उस लम्हे में नहीं थी जो गुज़र गया, बल्कि ख़ूबसूरती उस एहसास में है जो आज भी उसे याद करके दिल में जाग उठता है।”

​साहब ने मेज़ पर रखे कागज़ पर अपना क़लम उठाया। उनके लिए तस्वीर चेहरा दिखाती थी, लेकिन क़लम रूह का हाल बयान करता था। उन्होंने कागज़ पर बड़े सलीक़े से लिखा, ​”कितनी ख़ूबसूरत बात है ना कि गुज़रे लम्हों की याद हमें बताती है कि वो कितने ख़ूबसूरत थे।”

​उन्होंने महसूस किया कि उनकी पूरी ज़िंदगी, उनकी शायरी और उनकी मोहब्बतें दरअसल वही पुल हैं जो उनके अतीत और वर्तमान को आपस में जोड़े हुए हैं। वह पुरानी तस्वीर, वह आज की गुफ्तगू और वह ढलती हुई शाम,सब मिलकर एक ऐसी गज़ल बन रहे थे जिसका हर मिसरा (पंक्ति) शुक्रगुज़ारी और वफ़ा पर टिका था।

​शाम की उस गहरी खामोशी में  साहब के चेहरे पर एक इत्मीनान था। उन्हें समझ आ गया था कि जब तक यादें ज़िंदा हैं, इंसान कभी तन्हा नहीं होता, और जब तक साथ निभाने वाला हमसफ़र पास हो, हर गुज़रा हुआ लम्हा आज भी मुस्कुराता हुआ महसूस होता है।

— डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह सहज़ 

डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह

पिता का नाम: अशफ़ाक़ अहमद शाह जन्मतिथि: 24 जून जन्मस्थान: ग्राम बलड़ी, तहसील हरसूद, जिला खंडवा, मध्य प्रदेश कर्मभूमि: हरदा, मध्य प्रदेश स्थायी पता: मगरधा, जिला हरदा, पिन 461335 संपर्क: मोबाइल: 9993901625 ईमेल: dr.m.a.shaholo2@gmail.com शैक्षिक योग्यता एवं व्यवसाय शिक्षा,B.N.Y.S.बैचलर ऑफ़ नेचुरोपैथी एंड योगिक साइंस. बी.कॉम, एम.कॉम बी.एड. फार्मासिस्ट आयुर्वेद रत्न, सी.सी.एच. व्यवसाय: फार्मासिस्ट, भाषाई दक्षता एवं रुचियाँ भाषाएँ, हिंदी, उर्दू, अंग्रेज़ी रुचियाँ, गीत, ग़ज़ल एवं सामयिक लेखन अध्ययन एवं ज्ञानार्जन साहित्यिक परिवेश में रहना वालिद (पिता) से प्रेरित होकर ग़ज़ल लेखन पूर्व पद एवं सामाजिक योगदान, पूर्व प्राचार्य, ज्ञानदीप हाई स्कूल, मगरधा पूर्व प्रधान पाठक, उर्दू माध्यमिक शाला, बलड़ी ग्रामीण विकास विस्तार अधिकारी, बलड़ी कम्युनिटी हेल्थ वर्कर, मगरधा साहित्यिक यात्रा लेखन का अनुभव: 30 वर्षों से निरंतर लेखन प्रकाशित रचनाएँ: 2000+ कविताएँ, ग़ज़लें, सामयिक लेख प्रकाशन, निरन्तर, द ग्राम टू डे, दी वूमंस एक्सप्रेस, एजुकेशनल समाचार पत्र (पटना), संस्कार धनी (जबलपुर),जबलपुर दर्पण, सुबह प्रकाश , दैनिक दोपहर,संस्कार न्यूज,नई रोशनी समाचार पत्र,परिवहन विशेष,समाचार पत्र, घटती घटना समाचार पत्र,कोल फील्ड मिरर (पश्चिम बंगाल), अनोख तीर (हरदा), दक्सिन समाचार पत्र, नगसर संवाद, नगर कथा साप्ताहिक (इटारसी) दैनिक भास्कर, नवदुनिया, चौथा संसार, दैनिक जागरण, मंथन (बुरहानपुर), कोरकू देशम (टिमरनी) में स्थायी कॉलम अन्य कई पत्र-पत्रिकाओं में निरंतर रचनाएँ प्रकाशित प्रकाशित पुस्तकें एवं साझा संग्रह साझा संग्रह (प्रमुख), मधुमालती, कोविड, काव्य ज्योति, जहाँ न पहुँचे रवि, दोहा ज्योति, गुलसितां, 21वीं सदी के 11 कवि, काव्य दर्पण, जहाँ न पहुँचे कवि (रवीना प्रकाशन) उर्विल, स्वर्णाभ, अमल तास, गुलमोहर, मेरी क़लम से, मेरी अनुभूति, मेरी अभिव्यक्ति, बेटियां, कोहिनूर, कविता बोलती है, हिंदी हैं हम, क़लम का कमाल, शब्द मेरे, तिरंगा ऊंचा रहे हमारा (मधुशाला प्रकाशन) अल्फ़ाज़ शब्दों का पिटारा, तहरीरें कुछ सुलझी कुछ न अनसुलझी (जील इन फिक्स पब्लिकेशन) व्यक्तिगत ग़ज़ल संग्रह: तुम भुलाये क्यों नहीं जाते तेरी नाराज़गी और मेरी ग़ज़लें तेरा इंतज़ार आज भी है (नवीनतम) पाँच नए ग़ज़ल संग्रह प्रकाशनाधीन सम्मान एवं पुरस्कार साहित्यिक योगदान के लिए अनेक सम्मान एवं पुरस्कार प्राप्त पाठकों का स्नेह, साहित्यिक मंचों से मान्यता मुश्ताक़ अहमद शाह जी का साहित्यिक और सामाजिक योगदान न केवल मध्य प्रदेश, बल्कि पूरे हिंदी-उर्दू साहित्य जगत के लिए गर्व का विषय है। आपकी लेखनी ने समाज को संवेदनशीलता, प्रेम और मानवीय मूल्यों से जोड़ा है। आपके द्वारा रचित ग़ज़लें और कविताएँ आज भी पाठकों के मन को छूती हैं और साहित्य को नई दिशा देती हैं।

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