ग़ज़ल
इकरार तो हुआ मगर इसरार भी तो हो
उनको हमारे प्यार की दरकार भी तो हो
बेचैन बना देती है खामोशियां हमें
होठों पर कभी प्यार का इजहार भी तो हो
खुशियां मनाने साथ में दुनिया तमाम है
पर हम सुखन कोई कभी गम खार भी तो हो
मिल जाए सामने तो मिलेंगे तपाक से
अपनों की तरह साथ में व्यवहार भी तो हो
कितने भागीरथ आए और आकर चले गए
गंगा ये कह रही मेरा उद्धार भी तो हो
पीढ़ी तमाम जिसका नई अनुकरण करें
ऐसा जमाने में कोई किरदार भी तो हो
बस्ती हमारे ख्वाबों की उसे पार मिलेगी
पर साथ चलने के लिए कोई तैयार भी तो हो
जीना इसी का नाम है कहती है रवायत
और प्यार हो तो साथ में तकरार भी तो हो
मिलते हैं फेसबुक पर और करते हैं चैट भी
पर रूबरू उनका कभी दीदार भी तो हो
गरमा गरम पकौड़ियों के साथ चाय है
पर उसके साथ आज का अखबार भी तो हो
जिसकी उठाई दुम वही मादा निकल गया
इस मुल्क का सच्चा कोई सरदार भी तो हो
— डॉक्टर इंजीनियर मनोज श्रीवास्तव
