ग़ज़ल
दुनिया के साथ रह के भी दुनिया से दूर हैं
हम तो अकेले अपनी ही मस्ती में चूर हैं
दर्पण! भले ही लाख तू दिखला हमारे नुक़्स
जो भी हैं, वालिदैन की आँखों का नूर हैं
कैसी अदालतें हैं जो ईमान बेच कर
उनको सज़ाएं देती हैं जो बे-क़सूर हैं
इस भीड़ से शऊर की उम्मीद क्या करें
जब राहबर ही क़ाफ़िलों के बे-शऊर हैं
दो शे’र क्या कहे, ये ग़ुमाँ हो गया उन्हें
जैसे कि मीर, दाग़, या ग़ालिब या नूर हैं
बेशक वो साधु संत हो, या आम आदमी
दो-चार ऐब सब में ही होते ज़रूर हैं
— अजय अज्ञात
