बंधन
उसने पूछा – कैसे हो
मैने कहा – सब बढ़िया है
अपना दुःख-दर्द छिपाने का
यह एक पुराना जरिया है
चेहरे पर मुस्कान थी
अंदर एक तूफान था
उपर से मुखर था
अंदर से बेजुबान था
खामोशी को न पढ़ा करो
दबे जज्बातों का समंदर है
टूटे ख्वाहिशों ने रोके कदम
शोर बहुत अंदर है
बस थोड़ी देर क्या रूका
परवरिश बदनाम हो गयी
अब चाहता हूं सोना
शिकवा सरे आम हो गयी
कौन सा बंधन है
यह कैसा रिश्ता है
न नाकाम हो रहा
न मुकाम तक पंहुच रहा
— श्याम सुन्दर मोदी
