पर्यावरण

पृथ्वी मात्र एक ‘ग्रह’ नहीं, हमारा ‘अस्तित्व’ है

आज जब हम विश्व पृथ्वी दिवस मना रहे हैं, तो यह केवल कैलेंडर की एक तारीख़ नहीं, बल्कि मानवता के लिए आत्म-मंथन का एक क्षण होना चाहिए। इस वर्ष की थीम केवल नारों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उस चरम बिंदु की ओर इशारा कर रही है जहाँ से वापसी का मार्ग संकुचित होता जा रहा है।
विकास की अंधी दौड़ और प्रकृति का हाशिया ये विचारणीय है।
पिछली दो शताब्दियों में हमने ‘प्रगति’ की जिस परिभाषा को गढ़ा है, उसमें प्रकृति कहीं न कहीं गौण हो गई। हमने कंक्रीट के जंगलों को सभ्यता का मानक मान लिया और वास्तविक जंगलों को संसाधन की खान। आज परिणाम हमारे सामने हैं:
अनिश्चित जलवायु परिवर्तन और असमय वर्षा, भीषण लू और पिघलते ग्लेशियर अब केवल वैज्ञानिक शोधों के विषय नहीं, बल्कि हमारी रोजमर्रा की वास्तविकता हैं।
जैव विविधता का संकट, हर साल हजारों प्रजातियां विलुप्त हो रही हैं, जो हमारे पारिस्थितिकी तंत्र की उस कड़ी को कमज़ोर कर रही हैं जिस पर मानव जीवन टिका है।
हम एक ऐसे युग में जी रहे हैं जहाँ ‘उपयोग करो और फेंको’ की संस्कृति चरम पर है। प्लास्टिक प्रदूषण केवल महासागरों को ही नहीं, बल्कि हमारे भोजन के माध्यम से हमारे रक्त प्रवाह तक पहुँच चुका है। विश्व पृथ्वी दिवस पर विशिष्ट चिंतन इस बात पर होना चाहिए कि क्या हम आवश्यकता’और लालच के बीच की धुंधली रेखा को पहचान पा रहे हैं?
पृथ्वी हर मनुष्य की ज़रूरत को पूरा करने के लिए पर्याप्त संसाधन प्रदान करती है,
अक्सर हम पर्यावरण संरक्षण का उत्तरदायित्व सरकारों और अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों पर छोड़ देते हैं। लेकिन पृथ्वी का पुनरुद्धार एक जन-आंदोलन’ की मांग करता है। विशिष्ट बदलाव के लिए हमें तीन स्तरों पर कार्य करना होगा।
जीवनशैली में सादगी, न्यूनतम कार्बन फुटप्रिंट के साथ जीने की कला सीखना। ऊर्जा की बचत और जल संरक्षण को ‘विकल्प’ नहीं, बल्कि ‘कर्तव्य’ समझना।
सर्कुलर इकोनॉमी को बढ़ावा,, कचरे को संसाधन में बदलना। रिसाइकिलिंग से बेहतर है कि हम वस्तुओं के पुन: उपयोग और कम उपयोग की संस्कृति विकसित करें।
स्वदेशी ज्ञान का सम्मान, हमारी पारंपरिक पद्धतियां, जो प्रकृति के साथ तालमेल बिठाकर चलने की सीख देती हैं, उन्हें आधुनिक तकनीक के साथ जोड़ना होग।
आने वाली पीढ़ियों के लिए ऋण
हम इस पृथ्वी के मालिक नहीं, बल्कि इसके ट्रस्टी हैं। हमें यह ग्रह हमारे पूर्वजों से विरासत में नहीं मिला, बल्कि हमने इसे अपनी आने वाली पीढ़ियों से ‘उधार’ लिया है। आज का दिन संकल्प लेने का है,एक ऐसा संकल्प जहाँ विकास और पर्यावरण एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हों।
यदि हम आज भी नहीं संभले, तो इतिहास हमें उस पीढ़ी के रूप में याद रखेगा जिसने सब कुछ जानते हुए भी कुछ नहीं किया। आइए, इस पृथ्वी दिवस पर शब्दों से आगे बढ़कर कर्म की ओर बढ़ें।

— डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह सहज़

डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह

पिता का नाम: अशफ़ाक़ अहमद शाह जन्मतिथि: 24 जून जन्मस्थान: ग्राम बलड़ी, तहसील हरसूद, जिला खंडवा, मध्य प्रदेश कर्मभूमि: हरदा, मध्य प्रदेश स्थायी पता: मगरधा, जिला हरदा, पिन 461335 संपर्क: मोबाइल: 9993901625 ईमेल: dr.m.a.shaholo2@gmail.com शैक्षिक योग्यता एवं व्यवसाय शिक्षा,B.N.Y.S.बैचलर ऑफ़ नेचुरोपैथी एंड योगिक साइंस. बी.कॉम, एम.कॉम बी.एड. फार्मासिस्ट आयुर्वेद रत्न, सी.सी.एच. व्यवसाय: फार्मासिस्ट, भाषाई दक्षता एवं रुचियाँ भाषाएँ, हिंदी, उर्दू, अंग्रेज़ी रुचियाँ, गीत, ग़ज़ल एवं सामयिक लेखन अध्ययन एवं ज्ञानार्जन साहित्यिक परिवेश में रहना वालिद (पिता) से प्रेरित होकर ग़ज़ल लेखन पूर्व पद एवं सामाजिक योगदान, पूर्व प्राचार्य, ज्ञानदीप हाई स्कूल, मगरधा पूर्व प्रधान पाठक, उर्दू माध्यमिक शाला, बलड़ी ग्रामीण विकास विस्तार अधिकारी, बलड़ी कम्युनिटी हेल्थ वर्कर, मगरधा साहित्यिक यात्रा लेखन का अनुभव: 30 वर्षों से निरंतर लेखन प्रकाशित रचनाएँ: 2000+ कविताएँ, ग़ज़लें, सामयिक लेख प्रकाशन, निरन्तर, द ग्राम टू डे, दी वूमंस एक्सप्रेस, एजुकेशनल समाचार पत्र (पटना), संस्कार धनी (जबलपुर),जबलपुर दर्पण, सुबह प्रकाश , दैनिक दोपहर,संस्कार न्यूज,नई रोशनी समाचार पत्र,परिवहन विशेष,समाचार पत्र, घटती घटना समाचार पत्र,कोल फील्ड मिरर (पश्चिम बंगाल), अनोख तीर (हरदा), दक्सिन समाचार पत्र, नगसर संवाद, नगर कथा साप्ताहिक (इटारसी) दैनिक भास्कर, नवदुनिया, चौथा संसार, दैनिक जागरण, मंथन (बुरहानपुर), कोरकू देशम (टिमरनी) में स्थायी कॉलम अन्य कई पत्र-पत्रिकाओं में निरंतर रचनाएँ प्रकाशित प्रकाशित पुस्तकें एवं साझा संग्रह साझा संग्रह (प्रमुख), मधुमालती, कोविड, काव्य ज्योति, जहाँ न पहुँचे रवि, दोहा ज्योति, गुलसितां, 21वीं सदी के 11 कवि, काव्य दर्पण, जहाँ न पहुँचे कवि (रवीना प्रकाशन) उर्विल, स्वर्णाभ, अमल तास, गुलमोहर, मेरी क़लम से, मेरी अनुभूति, मेरी अभिव्यक्ति, बेटियां, कोहिनूर, कविता बोलती है, हिंदी हैं हम, क़लम का कमाल, शब्द मेरे, तिरंगा ऊंचा रहे हमारा (मधुशाला प्रकाशन) अल्फ़ाज़ शब्दों का पिटारा, तहरीरें कुछ सुलझी कुछ न अनसुलझी (जील इन फिक्स पब्लिकेशन) व्यक्तिगत ग़ज़ल संग्रह: तुम भुलाये क्यों नहीं जाते तेरी नाराज़गी और मेरी ग़ज़लें तेरा इंतज़ार आज भी है (नवीनतम) पाँच नए ग़ज़ल संग्रह प्रकाशनाधीन सम्मान एवं पुरस्कार साहित्यिक योगदान के लिए अनेक सम्मान एवं पुरस्कार प्राप्त पाठकों का स्नेह, साहित्यिक मंचों से मान्यता मुश्ताक़ अहमद शाह जी का साहित्यिक और सामाजिक योगदान न केवल मध्य प्रदेश, बल्कि पूरे हिंदी-उर्दू साहित्य जगत के लिए गर्व का विषय है। आपकी लेखनी ने समाज को संवेदनशीलता, प्रेम और मानवीय मूल्यों से जोड़ा है। आपके द्वारा रचित ग़ज़लें और कविताएँ आज भी पाठकों के मन को छूती हैं और साहित्य को नई दिशा देती हैं।

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