अधूरा आसमान
शहर की सबसे व्यस्त चौराहे के सिग्नल पर बारह साल के राजू के हाथ में कोई खिलौना नहीं, बल्कि एक गंदा कपड़ा और पानी की बोतल थी। जैसे ही लाल बत्ती जलती, वह भागकर गाड़ियों के शीशे साफ़ करने लगता। उसकी आँखों में वह चमक नहीं थी जो इस उम्र के बच्चों की पहचान होती है, बल्कि वहाँ एक ऐसी ख़ामोश संजीदगी थी जैसे वह अपनी उम्र से कई साल आगे निकल गया हो।
एक दोपहर, एक महंगी गाड़ी की पिछली सीट पर बैठे एक बच्चे ने रंगीन कहानियों की किताब खोल रखी थी। राजू ने शीशा साफ़ करते हुए एक पल के लिए उन तस्वीरों को देखा। उसे याद आया, बहुत समय पहले उसने भी एक ऐसी ही किताब का सपना देखा था। लेकिन फ़िर पिता की लंबी बीमारी और घर के चूल्हे की ठंडक ने उसे उन रंगीन गलियों से निकालकर धुएं और शोर भरी सड़कों पर ला खड़ा किया।
उसके नन्हे हाथ, जो कभी क़लम पकड़ने के लिए बने थे, अब सड़क की धूल और मेहनत से सख़्त हो चुके थे। उसके लिए स्कूल की घंटी की आवाज़ एक धुंधली याद बन चुकी थी। मंज़र भोपाली का वह शेर उस पर बिल्कुल सटीक बैठता था,उसने बचपन में खिलौने तो नहीं देखे, लेकिन वह सीधे उस ‘बुढ़ापे’ से जा मिला था जहाँ सिर्फ़ ज़िम्मेदारियाँ और फ़िक्र होती है।
शाम ढलते ही जब वह कुछ सिक्के जेब में डालकर घर लौट रहा था, तो उसे फुटपाथ पर एक टूटा हुआ प्लास्टिक का हवाई जहाज पड़ा मिला। उसने उसे उठाया, धूल झाड़ी और फिर एक लंबी आह भरकर वहीं छोड़ दिया। उसे महसूस हुआ कि वह अब बच्चा नहीं रहा। वक्त का पहिया इतनी बेरहमी से घूमा था कि उसका बचपन कहीं पीछे, उन अंधेरी गलियों में गुम हो गया था जहाँ अब सिर्फ़ थकान का राज था।
बचपन की ख़ुशहाली हर किसी की क़िस्मत में नहीं होती। समाज का एक बड़ा हिस्सा आज भी अपनी जवानी को ‘बुढ़ापे’ की थकान में गुज़ार रहा है। अगर हम इन नन्हे हाथों से बोझ छीनकर उन्हें सपने देखने का मौका दें, तभी शायद दुनिया की हर मुस्कुराहट के पीछे का अधूरापन खत्म हो पाएगा।
— डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह सहज़
