ग़ज़ल
रात ने कुछ तो कहा है
सुब्ह से ही अनमना है
ये सनातन सिलसिला है
ज़ुल्म दलितों पर हुआ है
काम जिसने भी किया है
बस उसी का दबदबा है
हलचलें कहती फिरें सब
कुछ वहाँ अद्भुत घटा है
है अलामत ये फतह की
जोर का नारा लगा है
— हमीद कानपुरी
रात ने कुछ तो कहा है
सुब्ह से ही अनमना है
ये सनातन सिलसिला है
ज़ुल्म दलितों पर हुआ है
काम जिसने भी किया है
बस उसी का दबदबा है
हलचलें कहती फिरें सब
कुछ वहाँ अद्भुत घटा है
है अलामत ये फतह की
जोर का नारा लगा है
— हमीद कानपुरी