कोठे की सीढ़ियां
यह दास्तान उस दौर की है जब रियासतों के सूरज ढल रहे थे, लेकिन खानदानी रसूख की तपिश अब भी जिस्मों को झुलसा रही थी। यह किस्सा है शाहनवाज़ खान,का, जो एक आलीशान रियासत के इकलौते वारिस और शहर के निहायत ऊंचे ओहदेदार थे। और दूसरी तरफ थी हुस्नआरा जिसके कोठे की सीढ़ियां चढ़ना रईसों के लिए बाइसे-फख्र (गर्व की बात) और आम आदमी के लिए महज़ एक हसरत थी।
हुस्नआरा का कोठा शहर के क़ल्ब (दिल) में वाकई था, जहाँ शाम होते ही चमेली के इत्र की महक और सारंगी की रूहानी तानें हवाओं में सहर (जादू) घोल देती थीं। शाहनवाज़ खान वहाँ किसी सरकारी तफ़्तीश के सिलसिले में पहुंचे थे। कानून की किताबों में डूबे शाहनवाज़ को ग़ुमान भी न था कि हुस्नआरा की एक ‘अदा’ उनके तमाम क़ायदों को कागज़ की कश्ती की तरह बहा ले जाएगी।
उस रात हुस्नआरा ने न मुजरा किया, न या गज़ल गाई, उसने बस अपनी मखमली आवाज़ और झील जैसी नशीली आँखों से शाहनवाज़ के रसूख का क़त्ल कर दिया। उस रात के बाद महफ़िल का रंग ही बदल गया। पहले वहाँ तमाशबीनों का शोर होता था, मगर अब सिर्फ़ साहिब-ए-आलम की मौजूदगी का सन्नाटा पसरा रहता। शहर ने देखा कि एक रसूखदार अफ़सर अब फ़ाइलों के बजाय रेशमी रुमालों और शराब की सुराहियों में गुम हो गया है।
शाहनवाज़ खान शादीशुदा थे। उनकी शरीक़-ए-हयात (पत्नी) मरियम सादगी और ख़ानदानी वक़ार (सम्मान) की मूरत थी। लेकिन शाहनवाज़ के लिए अब मरियम का पाकीज़ा हुस्न फ़ीका पड़ चुका था। उन्हें तो हुस्नआरा के लहज़े की वो ‘शराब’ और उसके हुस्न का वो ‘शबाब’ चाहिए था जो उन्हें उनकी ताक़त का ग़लत एहसास दिलाता था।
रफ़्ता-रफ़्ता शाहनवाज़ की गाड़ी का रुख़ मुड़ गया। ड्राइवर को अब दफ़्तर के पते भूल गए थे और उस बदनाम गली के मोड़ अज़बर (याद) हो गए थे। नौकरी से गैर-हाज़िरी अब एक आदत बन गई थी। उन्हें किसी का ख़ौफ़ न था, क्योंकि वो एक बड़ी रियासत के ज़मींदारके साहबज़ादे थे। उनके क़दम जवानी की उस ढलान पर थे जहाँ इंसान संभलने की कोशिश करे तो और ज़्यादा फ़िसलता चला जाता है।
एक दोपहर, जब सूरज की शिद्दत आसमान से आग बरसा रही थी, हुस्नआरा के कोठे के बाहर एक सफ़ेद पर्दानशीं पालकी रुकी। मरियम, अपने सुहाग और खानदानी ग़ैरत का वास्ता लेकर वहां पहुंची थी। उसे लगा था कि उसका रुतबा देख हुस्नआरा के हाथ-पांव फूल जाएंगे।
लेकिन अंदर का मंज़र रूह कपा देने वाला था। दोपहर के वक्त भी चिराग़ जल रहे थे। शाहनवाज़ खान नशे में चूर हुस्नआरा के घुटनों पर सर रखे दुनिया से बेख़बर सो रहे थे। मरियम की चीखें, उसकी इल्तजा (प्रार्थना) और उसकी ममतामयी पुकार उस कमरे की नक़्काशीदार दीवारों से टकराकर दम तोड़ गई। शाहनवाज़ ने एक पल को आँखें खोलीं, पर उनमें शनाख्त (पहचान) की कोई लकीर न थी। उन्होंने मरियम को ऐसे देखा जैसे कोई राह चलता अजनबी हो, और दोबारा हुस्नआरा की ज़ुल्फ़ों के साये में पनाह ले ली। मरियम हार गई। वह उस ‘मदिरा’ और शबाब के तिलिस्म को न तोड़ सकी।
वक्त गुज़रता रहा। मरियम हवेली लौट तो आई, लेकिन वो अब महज़ एक साया थी। वह दुःख़ की ऐसी आग में जली कि उसके फ़ेफ़ड़े जवाब दे गए। वह तन्हाई में खून थूकने लगी, मगर शाहनवाज़ को ख़बर न हुई।
उधर कोठे पर नशा अब ज़हर-ए-क़ातिल बन चुका था। शाहनवाज़ की सेहत ढलने लगी। उनका जिगर जवाब दे गया और हाथों में वो कँपकँपी आई कि जाम थामना मुश्किल हो गया। हुस्नआरा ने उन्हें कभी ‘शौहर’ का रुतबा नहीं दिया, क्योंकि उसकी रूह एक आज़ाद परिंदा थी जो किसी घर की चौख़ट को अपनी परवाज़ (उड़ान) के लिए बेड़ी समझती थी। उसने शाहनवाज़ को अपने दिल में जगह दी, मगर अपनी ज़िंदगी की दहलीज़ कभी पार करने न दिया।
एक सर्द काली रात, मरियम ने आख़िरी बार ख़ून थूका और हमेशा के लिए आँखें मूंद लीं। हवेली के दर-ओ-दीवार गवाह थे कि एक वफ़ादार औरत ने बेवाफ़ाई की भेंट चढ़कर अपनी जान दे दी। शाहनवाज़ खान उस जनाजे के कंधे को भी नसीब न हुए, क्योंकि वो उस वक्त नशे की गहरी खाई में गिरे हुए थे।
शाहनवाज़ का ओहदा छिन गया, रियासत नीलाम हो गई और जिस्म बीमारियों का घर बन गया। अब वो हुस्नआरा के कोठे के एक अंधेरे पिछवाड़े वाले कमरे में पड़े रहते थे। हुस्नआरा, जो कभी शहर की धड़कन थी, अब बूढ़ी और बेनूर हो चुकी थी। उसके चेहरे की झुर्रियों में उस बर्बाद मोहब्बत की पूरी दास्तान लिखी थी। वह रातों को जागती, शाहनवाज़ की ख़िदमात करती, उन्हें कड़वी दवाइयां पिलाती, पर उसकी आँखों में अब मोहब्बत नहीं, बल्कि एक गहरा पछतावा और वीरानगी थी
तारीख (इतिहास) ने अपने सफहों पर सुनहरे अक्षरों में नहीं, बल्कि स्याह (काली) स्याही से लिखा कि वह तवायफ़ कभी बीवी न बन सकी क्योंकि उसने अपनी आज़ादी से सौदा नहीं किया। और बीवी कभी अपना हक न पा सकी, क्योंकि उसका मुक़ाबला किसी औरत से नहीं, बल्कि एक ‘नशे’ से था।
कहानी वहाँ खत्म हुई जहाँ कोई भी न जीत सका। शाहनवाज़ खान एक बेनाम और बेबस मौत मरे। हुस्नआरा ने उनके इंतक़ाल के बाद कोठे पर घुंघरू तोड़ दिए, रोशनी बुझा दी और ख़ुद गलियों की धूल बन गई। जब इंसान अपनी ताक़त को गुनाहों का लाइसेंस समझ लेता है, तो वक्त उसे ऐसी जगह पटकता है जहाँ से वापसी का कोई रास्ता नहीं होता। जिस शख़्स ने अपने घर की रौनक़ (पत्नी) को महफ़िल की शमा के लिए क़ुर्बान किया, उसे आख़िरत में अंधेरा ही नसीब हुआ।
जब भी कदम बहकने लगें, तो शाहनवाज़ खान जैसे लोगों का ‘अंजाम’ याद कर लें। यह कहानी ख़त्म होकर भी खत्म नहीं होती, यह हर उस शख़्स के लिए एक आईना है जो ‘इश्क़’ और ‘हवस’ के फ़र्क को भूल जाता है।जो घर की लक्ष्मी (बीवी) का अनादर करता है, उसका विनाश निश्चित है।
यह कहानी अधूरी है, क्योंकि ऐसे हादसों का कभी कोई सुखद अंत नहीं होता। यह सिर्फ़ एक सबक़ बनकर हवाओं में तैरती रहती है। जज्बात और जुनून में एक बहुत बारीक़ लकीर होती है, अगर वक्त रहते उसे न पहचाना जाए, तो वह पूरे वजूद को ख़त्म कर देता है ”होश की एक घड़ी, उम्र भर की शर्मिंदगी से बेहतर होती है।”
— डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह सहज़
