स्त्री केवल आकार नहीं
नहीं लिखी गईं वंदनाएँ
नील गगन को छूती नारी पर,
नहीं जले शब्दों के दीपक
सूत्र सुलझाती बुद्धि-कुमारी पर।
नहीं बजे जय-घोष सभाओं में
अन्न जुटाती गृह-श्रमिका के,
नहीं गिने गए मौन तपस्या के
क्षण-क्षण जलते दीप शिखा के।
कितने दरिद्र रहे वे लोचन,
जो देह-द्वार पर ही रुक आए,
मन-मंदिर की ज्योति न देखी,
सागर-समान हृदय न पहचान पाए।
मैंने देखा—
उसके आँचल में नभ की सीमा,
उसकी दृष्टि में ज्ञान अपार,
उसकी करुणा में जग का स्पंदन,
उसके श्रम में जीवन-सार।
स्त्री केवल आकार नहीं है,
वह संवेदित सृष्टि-विस्तार,
जो उसको तन तक बाँधें,
वे खो देते सारा संसार।
— डॉ. प्रियंका सौरभ
