गीतिका/ग़ज़ल

गजल

मोहब्बत ने हमें क्या-क्या सितम हँसकर दिखाए हैं।
बहुत अरमाँ जलाए हैं, बहुत आँसू बहाए हैं।

कभी अपनों ने ही हमको अँधेरों से डराया था।
कभी उम्मीद के दीपक हवाओं ने बुझाए हैं।

सफ़र में ठोकरों ने भी बड़ा एहसान कर डाला।
गिरे जब लड़खड़ा करके, तो अपने मुस्कुराए हैं।

कभी रिश्तों की गर्मी ने कई मौसम जला डाले।
कभी लहज़ों की तल्ख़ी ने कई दिल भी दुखाए हैं।

रिझाने को जहाँ दुनिया सजाती है नए चेहरे।
वहीं कुछ लोग सादे से दिलों में घर बनाए हैं।

कभी अपनों ने चाहत में बहुत आघात कर डाले।
कभी गैरों ने पलकों पे नए सजे सपने सजाए हैं।

न जाने कितने ज़ख्मों को ज़माने से छुपाया था।
मगर आँखों ने चुपके से सभी क़िस्से बताए हैं।

“मृदुल” इस ज़िंदगी में लोग कैसे-कैसे आए हैं।
किसी ने ज़ख्म बाँटे हैं, किसी ने गुल खिलाए हैं।

— मंजूषा श्रीवास्तव “मृदुल”

*मंजूषा श्रीवास्तव

शिक्षा : एम. ए (हिन्दी) बी .एड पति : श्री लवलेश कुमार श्रीवास्तव साहित्यिक उपलब्धि : उड़ान (साझा संग्रह), संदल सुगंध (साझा काव्य संग्रह ), गज़ल गंगा (साझा संग्रह ) रेवान्त (त्रैमासिक पत्रिका) नवभारत टाइम्स , स्वतंत्र भारत , नवजीवन इत्यादि समाचार पत्रों में रचनाओं प्रकाशित पता : 12/75 इंदिरा नगर , लखनऊ (यू. पी ) पिन कोड - 226016