वृक्ष पत्तियाँ बदलते हैं, जड़ें नहीं
ऋतु बदली है
पर जड़ों की नमी
वैसी ही है
पीले पत्तों में
जीवन की थकान
धीरे उतरी
डाली ने फिर
नव हरियाली को
गले लगाया
आँधी आई
टहनियाँ झुकीं
जड़ें अडिग रहीं
धूप ने चूमी
मिट्टी की ख़ामोशी
सुगंध जागी
वर्षा की बूँद
पुराने तने पर
गीत लिख गई
वक़्त के साथ
चेहरे बदलते हैं
सत्य नहीं
नदी के पार
बरगद की छाया
अब भी वही
पत्तियाँ झरीं
फिर भी वृक्ष ने
आकाश थामा
मौन जड़ों में
पीढ़ियों की स्मृति
धीमे बहती
सर्द हवाएँ
तन को बदल सकीं
मन को नहीं
धरती सुनती
हर टूटे मौसम की
अनकही धुन
— डॉ. अशोक
