हर उर में तू ही छाया!
हर उर में तू ही छाया,
हर सुर में रहा गाया;
ना समझ कोई पाया,
जग तेरा रहा साया!
हर रूप रहा तेरा,
हर भूप रहा चेरा;
हर धूप तेरा फेरा,
हर जगह तेरा डेरा!
आता तुझे चलाना,
बनवाके कोई बहाना;
अपनी प्रकृति दिखाना,
सबसे चहे मिलाना!
तेरा स्वरूप हर ही में,
तेरा ही चित्त सभी में;
तू खेले हर के अहं में,
घोले तू खुद को उन्हीं में!
अद्वैत द्वैत बना किया,
गुण सगुण में ढाला किया;
‘मधु’ को सुधा सुमधुर किया,
कण गण को ब्रह्म बना दिया!
— डॉ. गोपाल बघेल ‘मधु’
