अघोषित बरसात
इस प्राकृति को इंसानों ने
बहुत धोखा दिया हैं!
वरना ये आसमां टूट कर
बे मौषम नही बरसते!
गर्मी बस शुरुआत हुई,
की लोग हाय तौबा मचाने लगे।
माना धूप से राहत के लिए
आसमां से गुजारिश थी
एक बूंद बारिश की
पर इस कुदरत को
सायद! मंजूर कुछ और ही था।
इस बारिश की सैलाब से भला,
खुश कोई कैसे रह सकता हैं!
घर के छतों पर खिली मधुमालती,
शुष्क और गीली पड़ी है।
गलियों ,सड़कों पर खिलने वाली,
गुलमोहर भी सड़को पर लिपटी है।
पता नही अब क्यों
मौषम वैज्ञानिकों का
कोई संदेश नही आता।
लगता है! वो भी पता भूल गए है।
इस साल जिंदगी,
सदाबहार नही हो सकती
काले बादलों ने खुशियों पर
बेरंग दाग ढाया हैं।
ग्रीष्म का कोई पता नही
लगता है फिर कोई
नया बरसात आया है!
— रेबेल रमेश खटकर
