चाहा उन्हें समुद्र दें, वे निकले बदहाल
चाहा उन्हें समुद्र दें, वे निकले बदहाल।
तालाबों में बिक गई, उनकी सारी चाल॥
जिनको सींचा प्रेम से, देकर अपना खून,
वही उड़ाकर ले गए, आँखों का सुकून।
चेहरे पर मुस्कान थी, भीतर गहरा जाल—
तालाबों में बिक गई, उनकी सारी चाल॥
अपने समझे हम जिन्हें, सौंपा दिल विश्वास,
वक्त पड़ा तो छोड़कर, बदल लिया अहसास।
सिक्कों पर तौले गए, रिश्ते और सवाल—
तालाबों में बिक गई, उनकी सारी चाल॥
लोभ-लालच की हवा, ऐसी चली जनाब,
सूख गए संवेदना, टूट गए सब ख्वाब।
स्वार्थों के बाजार में, बिक गया हर ख्याल—
तालाबों में बिक गई, उनकी सारी चाल॥
सौरभ अब यह जान ले, उनके सूने चाव,
सच्चे दिल को ही मिले, अक्सर केवल घाव।
पर समुद्र सा दिल रखो, चाहे मिले मलाल—
तालाबों में बिक गई, उनकी सारी चाल॥
— डॉ. सत्यवान सौरभ
