कविता

कविता- अब खुद को समझना सीख गई हूँ

पहले हर बात दिल पर लेती थी,
छोटी-सी बात में क्रोधित-सी होती थी,
लोगों के शब्दों के अर्थ ढूंढती थी,
फिर भी संतुष्ट नहीं होती थी।

अपनापन पाने को तरसती थी,
हर मुस्कान में सच्चाई ढूंढती थी,
झूठे वादों के झूठे झांसों में आकर,
अपने मन को खुश करलेती थी।

अब थोड़ा संभलना सीख गई हूँ,
खुद में ही खुशियां ढूंढ लेती हूँ,
अपनापन पाने की चाह छोड़ दी,
अच्छाई की तारीफ से अपना बना लेती हूँ।

मुस्कुराती हूँ अब विपरीत समय में भी,
व्यथा में भी सहज कथा बुन लेती हूँ,
पहले हर बात दिल पर लेती थी,
अब खुद को समझना सीख गई हूँ।

— लीला तिवानी

*लीला तिवानी

लेखक/रचनाकार: लीला तिवानी। शिक्षा हिंदी में एम.ए., एम.एड.। कई वर्षों से हिंदी अध्यापन के पश्चात रिटायर्ड। दिल्ली राज्य स्तर पर तथा राष्ट्रीय स्तर पर दो शोधपत्र पुरस्कृत। हिंदी-सिंधी भाषा में पुस्तकें प्रकाशित। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से रचनाएं प्रकाशित होती रहती हैं। लीला तिवानी 57, बैंक अपार्टमेंट्स, प्लॉट नं. 22, सैक्टर- 4 द्वारका, नई दिल्ली पिन कोड- 110078 मोबाइल- +91 98681 25244

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